“उनकी आँखों में नहीं”
मैं
उनकी आँखों में खोजा गया चेहरा नहीं हूँ,
मैं वह साँस हूँ
जो बिना अनुमति के चलती है।
जब दुनिया ने कहा—
“तुम ऐसे हो”,
मैंने मान लिया,
और उसी क्षण
अपने भीतर का सिंहासन
उधार दे दिया।
दूसरों की दृष्टि
आईना बनी,
और मैं
अपने ही प्रतिबिंब का
कैदी हो गया।
डर तब पैदा हुआ,
जब मेरे होने का प्रमाण
किसी और की स्वीकृति बन गया।
जहाँ निर्भरता है,
वहाँ आज़ादी
चुपचाप मर जाती है।
सहयोग हाथ मिलाना है,
बंधन नहीं।
प्रेम पास आना है,
डर की रस्सी नहीं।
मैं लोगों के बीच रहूँ,
हँसू, सुनूँ,
सीखूँ—
पर अपना मूल्य
उनकी मुट्ठी में
न दूँ।
मैं प्रतिक्रिया लूँ,
पर पहचान नहीं।
मैं सलाह सुनूँ,
पर आत्मा नहीं बेचूँ।
अब मैं
उनकी आँखों में नहीं,
अपने भीतर मौजूद हूँ—
और यही
निडर होने की
शुरुआत है।





