दिखावे का मन

दिखावे का मन

लोग आईने में नहीं,
आँखों में खुद को देखते हैं—
दूसरों की आँखों में।

दुकान की रोशनी में
शर्ट नहीं चुनी जाती,
अपनी कीमत तौली जाती है—
कहीं सस्ते न पड़ जाएँ हम।

गला थोड़ा और खुला,
जाँघ थोड़ी और ऊपर,
कपड़ा नहीं,
स्वीकृति पहनी जाती है।

फिर वही मन
रिश्तों की अलमारी खोलता है—
देखो मेरा साथी,
देखो मेरा प्रेम,
देखो मेरा जीवन।

कारें बोलती हैं,
घर इशारे करते हैं,
बच्चे भी कभी-कभी
प्रदर्शन की वस्तु बन जाते हैं।

तालियों से बनता है आत्म-मूल्य,
और चुप्पी में ढह जाता है मन।
यह कैसी आज़ादी है
जो हर नज़र की मोहताज है?

दिखावा इसलिए है
क्योंकि देखने का साहस नहीं है।
खुद को सीधे देखने का।

जो भीतर खड़ा होना सीख ले,
उसे बाहर की भीड़
कुछ साबित नहीं करवा पाती।

और जिस दिन
तालियों की ज़रूरत गिर जाती है,
उसी दिन
स्वतंत्रता
पहली बार
साँस लेती है।
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