स्वयं को देखना

स्वयं को देखना

खुद को जानने के लिए
मैंने प्रश्न नहीं पूछे,
मैंने अपने दिन देखे।

घड़ी की सुइयों ने बताया
मेरा समय कहाँ गिरता है,
और रात ने बताया
मेरा मन किसके पास भटकता है।

मैंने अपने शब्द नहीं गिने,
अपने कदम गिने—
वे बार-बार
उसी दिशा में जाते रहे
जिसे मैं स्वीकार नहीं करता था।

मैं बोला—
मैं न्याय चाहता हूँ,
मैं शांति चाहता हूँ,
मैं ऊँचा उठना चाहता हूँ।
पर मेरे कर्म
कुछ और ही कहते रहे।

मैं वही नहीं था
जो मैं पोस्ट करता था,
मैं वह था
जो मैं सहता रहा।

मैंने देखा—
मेरा डर मुझसे पहले चलता है,
मेरी लालसा
मेरे निर्णय लिखती है।

यह देखना
आइने में देखना नहीं था,
यह भीतर उतरना था—
जहाँ कोई प्रशंसा नहीं,
कोई बहाना नहीं।

अहंकार
सुंदर कहानी चाहता था,
पर सत्य
कहानी नहीं बनता।

जब झूठी छवि
धीरे-धीरे ढहने लगी,
तो दर्द हुआ,
पर उसी मलबे में
स्वतंत्रता की पहली साँस मिली।

अब मैं बदलने की जल्दी में नहीं हूँ।
मैं ठहरकर
देख रहा हूँ।

क्योंकि स्वयं को जानना
कुछ बन जाना नहीं,
बल्कि
जो नहीं हूँ
उसे साफ़-साफ़
देख लेना है।
Scroll to Top