भय झूठा है—परखो उसे
डर किसी घटना से नहीं आता,
डर आता है
अपने ही टूट जाने की कल्पना से।
तुम कहते हो—
“कुछ बुरा हो जाएगा।”
पर सच यह है—
डर खुद
सबसे बुरा हो चुका है।
घटना नहीं डराती,
तुम्हारी नाज़ुकता डराती है।
यह मान लेना कि
तुम सह नहीं पाओगे।
अगर तुम कह सको—
होने दो जो होना है,
दुनिया बिखर जाए,
पर मैं अछूता हूँ—
तो क्या डर बचेगा?
भय कहता है—
दुनिया तुमसे कुछ छीन लेगी।
पर भय झूठ बोलता है।
वह उन मान्यताओं पर पलता है
जिन्हें तुमने कभी परखा नहीं।
उन्हें परखो।
डर को ही कसौटी पर रखो।
सबसे बुरा होने दो।
देखो—
क्या सचमुच तुम मिट जाते हो?
टूटन के बीच भी
कुछ तुम्हारे भीतर
खड़ा रहता है।
हानि में भी
कुछ अछूता बचा रहता है।
पर एक जाल है—
अगर जीवन
ग़ैर-ज़रूरी चीज़ों पर टिका है,
वस्तुओं, लोगों, पहचानों, आशाओं पर—
तो डर
छाया बनकर साथ चलेगा।
निडर होना
घटनाओं को नियंत्रित करना नहीं है।
निडर होना है
उसमें जड़ जमाना
जो खो नहीं सकता।
दिखावे का साहस नहीं,
विवेक चाहिए।
तुच्छ से नाता तोड़ो,
डर
अपने आप
छूट जाएगा।
दुनिया
सिर्फ़ उसी को हिला सकती है
जो हिलने लायक है।
पहचानो
अपने भीतर
जो अडिग है।
वहीं खड़े रहो—
और मुक्त हो जाओ।





