डर कमजोरी नहीं, संदेश है

डर कमजोरी नहीं, संदेश है

डर दुश्मन नहीं है।
वह यूँ ही नहीं आता।
वह एक संदेश लेकर आता है—
यहाँ कुछ अधूरा है।

वह बाहर की ओर इशारा नहीं करता,
वह भीतर की दरार दिखाता है।
जहाँ तुम सत्य में जड़े नहीं हो,
जहाँ तुम उधार के सहारों पर खड़े हो।

डर कहता है—
यहाँ तुम अभी वास्तविक नहीं हो।

अगर तुम उसे सुनते नहीं,
तो तुम स्वयं को मजबूत मानते रहोगे।
डर वह व्यवधान है
जो अहंकार को झकझोरता है।
उसके बिना
अहंकार कल्पना में तैरता है।

तुम स्वयं को निडर कहोगे,
पर सच यह होगा—
तुमने सुनना बंद कर दिया है।
यह स्वतंत्रता नहीं,
सुन्नता है।

तुम साक्षात्कार से डरते हो,
क्योंकि खतरा सामने नहीं,
क्योंकि तुम्हारा मूल्य
स्वीकृति से बँधा है।

तुम निकटता से डरते हो,
क्योंकि प्रेम नहीं,
पहचान दाँव पर है।

अस्वीकृति से डरते हो,
क्योंकि भीतर
अब तक आधार नहीं मिला।

डर इन निर्भरताओं को उजागर करता है।
वह दिखाता है
जहाँ तुम अभी भी
दुनिया पर टिके हो।

डर को टालो मत।
उसे इस्तेमाल करो।
उसे दिखाने दो—
क्या झूठा है,
क्या नाज़ुक है,
क्या छोड़ना है।

जिस सुपरमैन का अभिनय तुम करते हो,
वह भी काँपता है।
और वही कंपन
सत्य की दस्तक है।

दरवाज़ा खोलो।
डर से पूछो—
तुम मुझे क्या दिखाने आए हो?

तब पाओगे—
हर डर के नीचे
कोई भ्रम है,
जो समझे जाने
और छोड़े जाने
की प्रतीक्षा कर रहा है।
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