काँपते हाथों से (With Trembling Hands)

काँपते हाथों से (With Trembling Hands)

निर्भयता
भय का अभाव नहीं है।
निर्भयता है—
भय के होते हुए भी
सही करना।

तुम पूछते हो—
क्या काँपते हाथ
सही कर्म कर सकते हैं?
हाँ।
और उसी में
एक गहरा आनंद छिपा है।

गलत रास्ता
अक्सर सहज लगता है।
वह तुम्हारी आदतों के साथ
बहता है।
कोई विरोध नहीं,
कोई कीमत नहीं।

पर सत्य?
वह चुनौती देता है।
उसकी ओर कदम रखते ही
भीतर प्रतिरोध उठता है।

डर, असहजता, भ्रम—
ये हमेशा गलत दिशा के संकेत नहीं।
अक्सर यही
सच्ची यात्रा की मुहर होते हैं।

काँपते हुए भी
सही करना—
यही शक्ति है।
यही अखंडता है।

डर दिखे तो
तुरंत पीछे मत हटो।
डर को रहने दो।
हाथ काँपें,
आवाज़ डगमगाए,
पर कर्म को मत गिराओ।

भय की उपस्थिति
रुकने का आदेश नहीं।
कभी-कभी
वह अहंकार की
आख़िरी कोशिश होती है
तुम्हें बाँधे रखने की।

झूठ इसलिए लुभाता है
क्योंकि वह आसान होता है।
वह जड़ता को
कभी चोट नहीं पहुँचाता।

सही काम
हमेशा कुछ माँगता है—
सच में,
कीमत के साथ।

आसान इसलिए मत पकड़ो
कि वह सुरक्षित लगता है।
कठिन इसलिए मत छोड़ो
कि वह डराता है।

आराम
सही होने का प्रमाण नहीं।
अक्सर वह
कायरता का मुखौटा होता है।

यदि तुम सत्य का मार्ग
समतल समझते हो,
तो जल्दी थक जाओगे।
कोई भी—
संत, ऋषि, उद्धारक—
बिना लड़खड़ाए नहीं चला।

नायकों की कहानियाँ छोड़ो।
उनकी भी
नींद उड़ी हुई रातें थीं।

आनंद
सहजता में नहीं,
सीधे खड़े रहने में है।
संघर्ष के न होने में नहीं,
उसके आगे न झुकने में है।

हाँ—
काँपते हाथ भी
सही कर्म कर सकते हैं।
और यही
एकमात्र
सच्ची विजय है।
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