जब मन गुर्राए, सुनो

जब मन गुर्राए, सुनो

डर, उथल-पुथल, बेचैनी—
इन्हें शत्रु मत समझो।
ये तुम्हें डराने नहीं,
कुछ बताने आते हैं।

जब भीतर सब ठीक नहीं लगता,
तो उसे दबाओ मत।
पूर्ण शांति तुम्हारी प्रकृति है।
उससे कम कुछ भी
संकेत है।

मन का अशांत होना
कभी यूँ ही नहीं होता।
वह उसी बोझ को ढोता है
जिसे तुमने मूल्य दिया है।

जो बेकार है,
वह क्यों बचा है?
क्योंकि तुमने उसे छोड़ा नहीं।

और छोड़ा क्यों नहीं?
क्योंकि तुम नहीं जानते
कि सच में ज़रूरी क्या है।

और ज़रूरी क्यों नहीं जानते?
क्योंकि तुमने कभी
ईमानदारी से नहीं पूछा—
मैं हूँ कौन?

तुम एक उधार की पहचान में
समझौता कर बैठे—
“मैं एक इंसान हूँ।”
पर स्रोत नहीं देखा
जहाँ से शरीर,
भाव,
विचार,
राय
और कर्म उठते हैं।

जब भीतर का इंजन गुर्राए,
तो सुनो।
अनदेखा मत करो।

जिससे मुँह मोड़ते हो,
उसे सुधार नहीं सकते।

और जब सच सुन लिया जाए,
तो बादल हटते हैं—
और आकाश
पहले से ही
नीला होता है।
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