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कोरोना अब तुम कब जाओगे?

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कोरोना अब तुम कब जाओगे?


इतना तो सता लिया हमें
और कितना सताओगे
कोरोना, सच-सच बतलाना
अब तुम कब जाओगे ?



जिस किसी को पाश में जकड़ा
तो पहले उसका गला पकड़ा
किसी को न तुम छोड़ रहे हो
पतला-दुबला हो या मोटा-तगडा़



इतना तो रूला दिया
और कितना रुलाओगे
कोरोना, सच-सच बतलाना
अब तुम कब जाओगे ?



बाजार खाया, रोजगार खाया
धन्धा खाया, व्यवसाय खाया
नौकरीयाँ खाई, मजदूरी खाई
अब शेष क्या रह गया भाई ?जाओगे



पहले ही बहुत छीन लिया तुमने
क्या सब कुछ छीनकर जाओगे
कोरोना, सच-सच बतलाना
अब तुम कब जाओगे ?



नवीन रिश्तों-नातों को खाया
बैंड-बाजों-बारातों को खाया
हसीन सपनों को भी निगला
फिर भी तेरा मन न पिघला ।



तुम कब? कैसे? पिघलोगे
हमें भी कुछ तो बताओगे
कोरोना सच-सच बतलाना
अब तुम कब जाओगें ?



जन-जीवन कितना गया बदल
कोई आज गया, कोई गया कल
आकाश को भी यही रहा खल
रवि असमय ही क्यों गया ढल ?



निराशा का तिमिर तो फैल गया
अब और कितना फैलाओगे
कोरोना, सच-सच बतलाना
अब तुम कब जाओगे?




कवि रमेश लक्षकार लक्ष्यभेदी बिनोता

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