KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

मनीभाई नवरत्न द्वारा रचित “हाथ फैलाते पथ पर” (hath failate path par)

दर-दर दोपहर
हाथ फैलाते पथ पर ।
कहीं झिड़कियां,
कहीं ठोकर।
बेबस बेचारगी झलके
सहज मुख पर।
दो पैसे का जुगाड़ बिन,
कैसे जायें घर पर?
दर-दर दोपहर
हाथ फैलाते पथ पर ।

आज बनी है
मन में बड़ी सवाली।
जब तक बजती रहेगी
गरीब की थाली।
देश विकास के सारे उदिम
महज  पोंगापंथी जाली।
मांगते मांगते रोटी
सूख रहे हैं अधर।
दो पैसे का जुगाड़ बिन,
कैसे जायें घर पर?
दर-दर दोपहर
हाथ फैलाते पथ पर ।।

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