मूर्ख कहते हैं सभी

मूर्ख कहते हैं सभी

मूर्ख कहते हैं सभी,उसका सरल व्यवहार है,
ज्ञान वालों से जटिल सा हो गया संसार है।

शब्द-शिल्पी,छंद-ज्ञाता,अलंकारों के प्रभो!
क्या जटिल संवाद से ही काव्य का श्रृंगार है?

जो नपुंसक हैं प्रलय का शोर करते फिर रहे,
नव सृजन तो नित्य ही पुरुषत्व का उद्गार है।

द्वेष रूपी खड्ग से क्या द्वेष का वध हो सका,
यदि चलाना आ सके तो प्रेम ही तलवार है।

सरहदों का जन्म भी गंदी सियासत से हुआ,
आदमी को जन्म दे वह तत्त्व केवल प्यार है।

टूट जाते गीत के लय,शब्द के संघर्ष में,
भग्नता के हाथ में यदि भावना का तार है।

हो गई है मूक कोयल,है ग्रहण सा सूर्य पर,
उल्लुओं की मौज जब तक निशिचरी सरकार है ।

रेखराम साहू  (बिटकुला, बिलासपुर छग )

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