सुविधा के विरुद्ध सत्य
हिंदी कवितासुविधा के विरुद्ध सत्य मैंने देखा—लोग सच नहीं ढूँढते,वे अपनी सुविधा ढूँढते हैं। भीड़ के कंधों पर चढ़करहर कोई ऊँचा दिखना चाहता है,पर अपने भीतर उतरने सेसब डरते हैं। हम शोर को संवाद कहते हैं,सूचनाओं को समझ,और आदतों को जीवन। जो बिना प्रश्न चले,वही स्वीकार्य हो जाता है;जो ठहरकर देखे—वह असुविधाजनक ठहरता है। स्वतंत्रताकोई उपहार
सुविधा के विरुद्ध सत्य Read More »







