मृत्युभोज पर कविता

मृत्युभोज पर कविता

kavita

मृत्युभोज
(16,14)
जीवन भर अपनो के हित में,
मित हर दिन चित रोग करे।
कष्ट सहे,दुख भोगे,पीड़ा ,
हानि लाभ,के योग करे,
जरा,जरापन सार नहीं,अब
बाद मृत्यु के भोज करे।

बालपने में मात पिता प्रिय,
निर्भर थे प्यारे लगते।
युवा अवस्था आए तब तक,
बिना पंख उड़ते भगते।
मन की मर्जी राग करेे,जन,
मनइच्छा उपयोग करें।
जरा,जरापन सार नहीं,पर
बाद मृत्यु के भोज करे।

सत्य सनातन रीत यही है,
स्वारथ रीत निभाई है।
अन उपजाऊ अन उत्पादी,
मान, बुजुर्गी छाई है,
कौन सँभाले, ठाले बैठे,
कहते बूढ़े मौज करे।
जरा,जरापन सार नहीं,पर
बाद मृत्यू के भोज करे।

यही कुरीति पुरातन से है,
कल,जो युवा पीढ़ियांँ थी,
वो अब गिरते पड़ते मरते।
अपनी कभी सीढ़ियाँ थी।
वृद्धाश्रम की शरण चले वे,
नर नाहर, वे दीवाने।
जिनके बल,वैभव पहले के,
उद्घोषित वे मस्ताने।,
आज वही है पड़े किनारे,
राम राम कह राम हरे।
जरा,जरापन सार नहीं,पर,
बाद मृत्यु के भोज करे।

कुल गौरव की रीत निभानी,
सिर पर ताज पाग बंधन।
मान बड़प्पन, हक, पुरखों का,
माने काज करे वंदन।
जो शायद अध-भूखे-प्यासे,
एकल रह बिन – मौत मरे,
जरा,जरापन सार नहीं, पर
बाद मृत्यु के भोज करे।

एक रिवाज और पहले से
ऐसा चलता आता है,
बड़ भागी नर तो जीवित ही,
मृत्यु भोज जिमाता है।
वर्तमान में रूप निखारा,
सेवा निवृत्ति भोज करे।
जरा,जरापन सार नहीं,पर,
बाद मृत्यु भोज के करे।
. ______
बाबू लाल शर्मा, बौहरा विज्ञ

इस रचना को शेयर करें

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top