प्रकृति की पुकार (अतुकान्त कविता)
मैं नदी हूँ—
पर अब बह नहीं पाती,
मेरे आँचल में ज़हर है,
और किनारों पर
तुम्हारी लापरवाही।
मैं वृक्ष हूँ—
छाया देने को खड़ा था,
पर तुमने
मेरी जड़ों में
लोभ का कुल्हाड़ा गाड़ दिया।
मैं हवा हूँ—
कभी साँस थी तुम्हारी,
अब धुआँ बनकर
फेफड़ों में
चुभ रही हूँ।
मैं धरती हूँ—
माँ कहलाती हूँ,
पर मेरी कोख में
बारूद बोया गया,
और तुम पूछते हो
आपदाएँ क्यों आती हैं?
सुनो मानव!
मैं प्रतिशोध नहीं लेती,
मैं केवल चेतावनी देती हूँ।
यदि अब भी नहीं जागे,
तो मेरी चुप्पी ही
तुम्हारा अंतिम शोर होगी।






