KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

प्रायश्चित- मनीभाई नवरत्न

[प्रायश्चित]

हम करते जाते हैं काम
वही जो करते आये हैं
या फिर वो ,
जो अब हमारे शरीर के लिए
है जरूरी।

इस दरमियान
कभी जो चोट लगे
या हो जाये गलतियां।
तो पछतावा होता है मन में
जागता है प्रायश्चित भाव।

वैसे सब चाहते हैं
गलतियां ना दोहराएं जाएं।
सब पक्ष में हैं
सामाजिक विकास अग्रसर हो।
गम के बादल तले,
सुखों का सफर हो ।

अब की बार, ठान कर
जब फिर से आयें मैदान पर।
और नहीं बदले खुद को।
नहीं समझे अपने वजूद को।
दोहराते हैं फिर से भूल।
झोंकते हैं अपने ही आंखों में धूल।

तो जान जाइए,
एक ही सांचे में अलग-अलग मूर्ति
नहीं ढाली जा सकती।
या फिर हरियाली पाने के लिए
जड़ों को छोड़
पत्तियाँ नहीं सींची जाती।

यदि इंसान करना ना चाहे
स्वयं में बदलाव ।
तो गलतियां होती रहेंगी
यदा, कदा, सर्वदा।
चाहे करते रहें पछतावा
या फिर लेते रहें अनुभव ।

अपनी गलती को न समझना ही
हमारी मूल गलती है ।
जो इंसान समझे इसे करीब से
कर्म के साथ बदल दे खुद को ।
राह के साथ बदल दे दिशा को ।
तो समझो
काट दिया उसने गलती का पौधा
कर लिया अपना प्रायश्चित।
मानो जन्म ले लिया हो
फिर से ।

मनीभाई नवरत्न

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