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रोग बड़ा कोरोना आया- बाबा कल्पनेश की कविता

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रोग बड़ा कोरोना आया

रोग बड़ा कोरोना आया,लाया भारी हाहाकार।
रुदन-रुदन बस रुदन चतुर्दिक्,छाया प्रातः ही अँधियार।।
बंद सभी दरवाजे देखे,मिलने जुलने पर भी रोक।
पत्थर दिल मानव का देखा,शीश पटकता जिस पर शोक।।

लहर गगन तक उठती-गिरती,देखा लहर-लहर उद्दाम।
दूरभाष पर कल बतियाया,गया मृत्यु के अब वह धाम।।
अपने जन का काँध न पाया,विवश खड़े सब अपने दूर।
अपने-अपने करतल मींजे,स्वजन हुए इतने मजबूर।।

घर के भीतर कैद हुए सब,वैद न कर पाए उपचार।
अधर-अधर सब मास्क लगाए,दिखे अधिक मानव हुशियार।।
प्रथम लहर आयी थी हल्की,धक्का रही दूसरी मार।
हट्टे-कट्टे स्वस्थ दिखे जो,गिरते वे भी चित्त पिछार।।

इतनी आफत कभी न आई,मानव हुए सभी लाचार।
शिष्टाचार सभी जन भूले,सामाजिकता खाये मार।।
गए-गए सो दूर गये जो,जो हैं उन्हें मिले धिक्कार।
सब जन निज लघुता में सिमटे,विवश कर रही है सरकार।।

नये सिरे से छुआ-छूत का,खुलता देख रहा हूँ द्वार।।
भले मुबाइल व्हाट्स एप पर,दीखे सुंदर शिष्टाचार।
पर अपने जीवन में मानव,लगा भूलने निज व्यवहार।।
सरक रहा है मानवता का,बना बनाया दृढ़ आधार।।

जितना डरा हुआ है मानव,कलम बोलती केवल हाय।
देह रक्त के संबंधों पर,रही भयानकता मड़राय।।
कोरोना की काली छाया,करती बहुत दूर तक मार।
कौन यहाँ इसका अगुवा है,देने वाला इतना खार।।

बाबा कल्पनेश
सारंगापुर-प्रयागराज

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