KAVITA BAHAR
SHABDON KA SHRIGAR

सायकिल दिवस विशेष कविता (31 may cycle day special poem)

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अपने बचपन में , की थी जिससे यारी।

वो मेरी सायकिल,जिसमें करूँ सवारी ।

आज बदहाल पड़ा, कहीं किसी कोने में

सेवा कर गुजारी, जिसने जिंदगी सारी।

ना वो ईंधन लेता, ना फैलायें प्रदूषण ।

ना दुर्घटना का भय,सुरक्षित हो जीवन।
ना कोई झंझट दें, ना पार्किंग असुविधा
ना है कोई ड्राइविंग लायसेंस का टेंशन।
आज सायकिल छोड़ , ऐसा लगा मानो
मैंने अपने जीवन में, भूल की बड़ भारी।
अब सायकिल-यात्रा ,है बड़ी होशियारी।

साइकिल से हो जाती ,पैसों की बचत।
साइकिल से हो जाती , थोड़ी कसरत।

अनेक समस्याओं का है ,वो समाधान।

आज सायकिल बनी है , बड़ी जरूरत।
मोटापा बन जाता है,कई रोगों की खान।
सायकिल चलाके दूर करें, यह बीमारी।
अब सायकिल-यात्रा ,है बड़ी होशियारी।

मोटर,कार निकालती है, दिन रात जहर।
संकट के बादल मंडराते,अब गांव शहर।
यूं तो धन-दौलत की कमी नहीं है हमको
तथापि,सायकिल से करनी होगी सफर।
समय से पहले आओ करलें पूरी तैयारी ।
अब सायकिल-यात्रा ,है बड़ी होशियारी।
(रचयिता :- मनी भाई भौंरादादर बसना )