विधवा पर कविता

मैंने अपनी स्वरचित कविता “विधवाएं” कुछ समय पहले ही लिखी है ,और इसे लिखने के लिए प्रेरणा भी मुझे यथार्थ ही मिली। कि हम चाहे कितनी ही तरक्की क्यूं न कर ले मगर हमारी सोच औरतों को लेकर अब भी संकीर्ण ही है।

विधवा पर कविता

Kavita-bahar-Hindi-doha-sangrah

वे मांए जो वक्त से पहले हो जाती हैं विधवाएं
वे कभी- कभी बन जाया करती हैं प्रेमिकाएं
उनके अंदर भी प्रेम फ़िर से एक नए रंग में दाखिल होने लगता है
लेकिन उनका ये बदला रूप चुभने लगता है
ऐसे समाज ,परिवार और घर को
जो सिर्फ़ करते हैं बातें सतही
वे नहीं सहन कर पाते ऐसे बदलाव को जिसमें होती है उनकी छवि धूमिल
जिसे गढ़ा जाता रहा है ख़्वाहिशों की अधमरी पीठ पर
उन्हें चाहिए रहती ,सदा वो भोली गुड़िया जिसे अपने हिसाब से चलाया जा सके
जब तक विधवाएं अपने गुज़रे पति की याद में आंसू बहाती हैं
तब तक
बेचारी ,अबला ,अकेली ,कैसे काटेगी ज़िंदगी अकेले बोलकर ज़ाहिर करते हैं संवेदनाएं
लेकिन जब
वे ख़ुद को संवारने, स्व जीने की करती हैं कोशिश
तब दिखता है दोगला रूप समाज का
कुल्टा ,चरित्रहीन ,बेशर्म ,घर का नाश करने वाली डायन आदि अनगिनत नामों को अपने नाम के पर्याय से दर्ज़ करवा चुकी होती हैं
विधवाएं

विभा परमार,पत्रकार थिएटर आर्टिस्ट।
बरेली उत्तर प्रदेश।

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