जाति धर्म पर कविता

जाति धर्म पर कविता

इंसान-इंसान के बीच
कितनी हैं दूरियां
इंसान-इंसान को
नहीं मानता इंसान
मानता है
किसी न किसी
जाति का
धर्म का
प्रतिनिधि
इंसान की पहचान
इंसानियत न होकर
बन गई पहचान
जाति व धर्म

हो गई परिस्थितियां
बड़ी विकट
विवाह-शादी
कार-व्यवहार
क्रय-विक्रय
सब कुछ में
दी जाती है वरीयता
अपनी जाति को
अपने धर्म को
जाति-धर्म ही
सबसे बड़ी बाधा है
मानव के विकास में

-विनोद सिल्ला©

बहार
बहार
🔗 इस कविता को साझा करें
📱 WhatsApp
✅ लिंक कॉपी हो गया!

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

0 thoughts on “जाति धर्म पर कविता”

Login
🔐
कवि बनें
Scroll to Top