कविता बहार

अपना फूल खोजो

अपना फूल खोजो

सच्चा प्रेम
सुख नहीं देता।
वह परीक्षा लेता है।
खींचता है।
तोड़ता है।
वह शिल्पकार की छेनी है—
जो निर्दयता से
अनगढ़ पत्थर पर पड़ती है,
जब तक
रूप प्रकट न हो जाए।

जो तुम्हें
पूर्ण संतोष दे सकता है,
वह तुम्हें
वैसा ही रहने
कभी नहीं देगा
जैसे तुम हो।
विस्तार
केवल विस्तृत को
मिलता है।
और विस्तृत होने के लिए
तुम्हें छोटा होना
छोड़ना पड़ेगा।

तुम वही बनते हो
जिसे तुम सच में चाहते हो।
तुम्हारा लक्ष्य
तुम्हारी बनावट
निर्धारित करता है।
यदि तुम कीचड़ से
प्रेम करते हो,
तो केंचुआ बन जाओगे।
यदि आकाश से
प्रेम करते हो,
तो पंख उगेंगे।
यदि
तुच्छताओं को
पूजते रहोगे,
तो तुच्छ ही रहोगे।

पर यदि
किसी अत्यंत विराट के आगे
नतमस्तक हो गए—
तो तुम्हारी पूरी
व्यक्तित्व-संरचना टूटेगी,
जलेगी,
और उसी के रूप में
पुनर्गठित होगी।

कुछ अलग चाहना
खुद के विरुद्ध
खड़ा होना है।
तुम्हें अपने ही
तंत्र के खिलाफ
जाना पड़ेगा।

रूपांतरण
पीड़ारहित नहीं होता।
पूरा तंत्र
टूटने पर मजबूर होगा।
जलने पर मजबूर होगा।
फिर नया जन्म लेगा।

कहते हैं—
तितली संयोग से नहीं बनती।
वह फूल से
प्रेम के कारण बनती है।
उस असंभव
प्रेम के बिना
रूपांतरण
कभी नहीं होता।

तो जाओ।
अपना
फूल खोजो।
और उसके आगे
बिना किसी
समझौते के
समर्पित हो जाओ।

क्योंकि जो तुम्हें
सच में
बदल सकता है—
वही तुम्हारे प्रेम के
योग्य है।

एक पत्थर था।
सदियों से
नदी के किनारे पड़ा हुआ।
उसने
जल की ठंडक को
सुख समझ लिया था।
लहरें आती थीं,
छूती थीं,
चली जाती थीं।
पत्थर उसी को
प्रेम कहता था।

पर एक दिन
पहाड़ से
छेनी उतरी।
उसका पहला प्रहार हुआ।
पत्थर चिल्लाया—
“यह प्रेम नहीं हो सकता।”
दूसरा प्रहार हुआ।
“यह तो हिंसा है।”
तीसरा प्रहार हुआ।
“मुझे जैसा हूँ
वैसा ही रहने दो।”
पर छेनी
सुनती नहीं थी।
छेनी जानती थी—
यदि इसे
पत्थर की इच्छा से चलाया गया,
तो कभी मूर्ति नहीं बनेगी।
कई दिनों तक
प्रहार होता रहा।
रातों तक पत्थर
अपने टूटने को
मृत्यु समझता रहा।
धीरे-धीरे जो गिरता गया,
वह पत्थर नहीं था—
वह उसकी जड़ता थी।
वह उसकी सुविधा थी।
वह उसका “मैं ठीक हूँ” था।

और एक दिन—
जब सब कुछ टूट चुका था,
जब कुछ भी बचाने लायक नहीं था,
तभी पहली बार
आकृति दिखाई दी।
पत्थर अब पत्थर नहीं था।
वह खुद को
पहचान नहीं पा रहा था।
लोग आए।
नतमस्तक हुए।
और बोले—
“यह तो मूर्ति है।”

पर मूर्ति जानती थी—
यह सम्मान
उसके लिए नहीं,
उस प्रेम के लिए है
जो निर्दय था,
पर सच्चा था।
तभी एक दूसरा पत्थर
नदी किनारे
और गहराई से
जम गया।
उसने कहा—
“मैं सुरक्षित हूँ।
मुझे किसी छेनी की ज़रूरत नहीं।”
और वह
सदियों तक
पत्थर ही रहा।

क्योंकि हर कोई
मूर्ति बनने नहीं आया।
कुछ लोग
सिर्फ़ टूटने से बचने आए हैं।
और जो
टूटने से बचते हैं—
वे बदलने से वंचित रह जाते हैं।

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