कविता बहार

"कविता बहार" हिंदी कविता का लिखित संग्रह [ Collection of Hindi poems] है। जिसे भावी पीढ़ियों के लिए अमूल्य निधि के रूप में संजोया जा रहा है। कवियों के नाम, प्रतिष्ठा बनाये रखने के लिए कविता बहार प्रतिबद्ध है।

यदि सब चला जाए, तो क्या बचेगा?

हिंदी कविता

यदि सब चला जाए, तो क्या बचेगा? तुम अपने बारे मेंजो सोचते हो—क्या वहीवास्तव मेंतुम हो? हम अहंकार कोअकड़ समझ लेते हैं।किसी का सीना तना देखकह देते हैं—इसे अहंकार है। पर अहंकारइतना सतही नहीं। अहंकार है—“मैं हूँ।” औरजिसके साथतुम इस “मैं हूँ” कोजोड़ देते हो,वहीअहंकार बन जाता है। “मैं महान हूँ”—अहंकार।“मैं कमजोर हूँ”—अहंकार। “मैं पीड़ित

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इतने होशियार कि विवेक खो बैठे

हिंदी कविता

इतने होशियार कि विवेक खो बैठे डर और लालच से चलीचतुराई—मूर्खता का हीदूसरा नाम है। निरर्थक कामों मेंहम कितने सफल हैं!खुद को खुश करने के लिएहमेशाकोई रास्ता निकाल लेते हैं। चूहे की तरह—घर में घुसने काछेद जानते हैं।और अगर न हो,तोखुद खोद लेते हैं। हमारी सारी होशियारीछोटी-छोटीलालसाओं के लिएआरक्षित है। क्या हम मूर्ख हैं?नहीं। बेकार

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अंदर की आग, बाहर की राख

हिंदी कविता

अंदर की आग, बाहर की राख जंगल जल रहे हैं—पर यहसिर्फ पेड़ों की आग नहीं है। यह मन की आग हैजो दिखाई देने लगी है। धरती के जंगलऔर मनुष्य का मन—दो अलग त्रासदियाँ नहीं।दोनोंएक ही आग मेंभस्म हो रहे हैं। यह आगभूख है।लालच है।झूठी पहचानों कीअंतहीन जलन है। पूरा होने की चाह मेंमनुष्य नेदुनिया को

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जिसने गलती की, उससे आगे बढ़ जाओ

हिंदी कविता

जिसने गलती की, उससे आगे बढ़ जाओ सबसे कठोर सज़ा यह नहीं कितुम खुद को दंड दो—सबसे कठोर सज़ा है कहना:मैं वैसा बना नहीं रहूँगा। सज़ाबदला नहीं होती।सज़ासुधार है। जो दंडसिर्फ पीड़ा दे,पर दृष्टि न खोले—वह न्याय नहीं,अहंकार का अभिनय है। असल दंडघटना पर नहीं पड़ता।क्षण पर नहीं।कर्म पर भी नहीं। वह पड़ता हैकरने वाले

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एक ही भूल सौ बार

हिंदी कविता

एक ही भूल सौ बार क्या सच मेंकोई नई भूल होती है? ध्यान से देखो—जो आज तुम्हें गिरा रहा है,वही तोपाँच साल पहले भीतुम्हें हराकर गया था। नाम बदल गए,चेहरे बदल गए,परप्रवृत्ति?वह वहीं की वहीं है। गिरने की जगह बदली,समय बदला,बहाना बदला—पर गिरनाक्या कभी बदला? तुम कहते हो—इस बार अलग है।पर क्या सच में?या फिरपुराना

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अतीत ही वर्तमान है

हिंदी कविता

अतीत ही वर्तमान है अतीतपीछे नहीं रहता—यदि तुमने उससेसीखा नहीं। वह भविष्य बनकरलौट आता है,नए कपड़ों में,नए नाम से। लोग कहते हैं—भूल जाओ।छोड़ दो।केवल वर्तमान में जियो। पर यह ज्ञान नहीं,यह पलायन है—स्वतंत्रता काभेष बदले डर। जिसे तुम“अभी” कहते हो,वह अक्सरबीते हुए काछलावा होता है। वर्तमानकोई नई ज़मीन नहीं—वह अतीत कीछाया है,जो आज परपड़ी हुई

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घाव इकट्ठा करना बंद करो

हिंदी कविता

घाव इकट्ठा करना बंद करो कोई तुम्हेंअंदर से चोट नहीं पहुँचा सकताजब तक तुमउसे अनुमति न दो। लोग चोट पहुँचा सकते हैं,पर नुकसान उतना नहींजितना तुमउसे सीने से लगाकरखुद कर लेते हो। घटना बाहर घटती है,पर तुम उसेपहचान बना लेते हो।यही असली हिंसा है। दुनिया दरवाज़ा खटखटाती है—खरोंचती है,धक्का देती है—पर केंद्र तकवह नहीं पहुँच

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पवित्र आठ-चरणीय आत्महत्या

हिंदी कविता

“पवित्र आठ-चरणीय आत्महत्या” तुम भटके नहीं हो—तुम राजमार्ग पर हो।चमकदार,चौड़ा,सुरक्षित।और यहीख़तरा है। जन्म,पढ़ाई,नौकरी,शादी,घर,गाड़ी,बच्चे,झगड़े,थकान,मृत्यु। जीवन नहीं—कन्वेयर बेल्ट। इसेपवित्र कहा गया।क्योंकिसब यही करते हैं। और जोसब करते हैं,उसेकौन सवाल करता है? हम आधे रास्ते पर हैं,फिर भीकहते हैं—“मेरा जीवन अलग है।” अलग कैसे?सड़क वही,ईंधन वही,भीड़ वही। पर उम्मीद—कि मंज़िलअद्भुत होगी। अरबों लोगइसी राह से गुज़रे,सम्मानजनक निराशा मेंडूबे।

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माता-पिता, पहले स्वयं को उठाओ

हिंदी कविता

“माता-पिता, पहले स्वयं को उठाओ” बच्चे को सँवारने से पहलेखुद को सँभालो। क्योंकिबच्चातुम्हारे उपदेश से नहीं,तुम्हारी स्थिति सेसीखता है। यदि घर मेंजाग्रत माँ है,जाग्रत पिता है—तोबच्चे के डरबिना समझाएघुल जाते हैं। तुम्हारी उपस्थितिपाठ बन जाती है। पहला कर्तव्यबच्चे को ठीक करना नहीं,खुद कोजगाना है। क्योंकिघायल मनकेवलघाव हीदे सकता है। तुमप्रेम का अभिनय कर सकते हो,परअचेतनहर

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अधूरापन का उद्योग”

हिंदी कविता

“अधूरापन का उद्योग” तुमसे कहा गया—तुम पूरे नहीं हो। इसलिएतुम दौड़े—डिग्रियों के पीछे,पदोन्नतियों के पीछे,रिश्तों,सामानों,सपनों के पीछे। एक खाली जगह भरने,जो शायदकभी थी ही नहीं। इसेप्रेरणा कहा गया। पर यहडर पर पलती है,तुलना पर जीती है,शर्म से बिकती है। पहलेतुम्हें तोड़ा गया,फिरमरहम बेचा गया। कहा गया—देखोफलाँ का बेटा। कहा गया—आदमी के बिनातुम कुछ नहीं। कहा

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तीसरी स्त्री

हिंदी कविता

“तीसरी स्त्री” पहली स्त्री—जिसेजीवविज्ञान के नाम परसंस्कारों ने गढ़ा।सिखाया गया—मुस्कराओ,सह लो,सज कर रहो।तुम्हारी कीमततुम्हारे शरीर में है। दूसरी स्त्री—विद्रोही।क्रोधित,तैयार।उसने कहा—मैं भी वही करूँगीजो तुम करते हो।वही कपड़े,वही भाषा,वही दौड़। पर शांति?वह भी नहीं मिली। दासता बदली,पर ढाँचा वही रहा।प्रतिक्रियादोहराव बन गई। और अबतीसरी स्त्री कीसंभावना है। न परंपरा की कैदी,न विद्रोह की नकल। वहन शरीर

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बलात्कार जहाँ सच में शुरू होता है

हिंदी कविता

“बलात्कार जहाँ सच में शुरू होता है” बलात्कारकोई अचानक घटितदुर्घटना नहीं,वहधीरे-धीरे पनपताहुआअंतिम विस्फोट है। यह तब शुरू होता हैजब दुनियाभोग की वस्तुबन जाती है। जब प्रगति का अर्थऔर ज़्यादा लेना,और ज़्यादा तोड़ना,और ज़्यादा जीतनाहो जाता है। छूने से पहलेकभी पूछा—इस स्पर्श मेंप्रेम है,यास्वार्थ? अगर स्पर्शसिर्फ़लेने के लिए है,तोशोषण दूर नहीं। रेखाबहुत पतली है। बलात्कारघर में

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