कविता बहार

"कविता बहार" हिंदी कविता का लिखित संग्रह [ Collection of Hindi poems] है। जिसे भावी पीढ़ियों के लिए अमूल्य निधि के रूप में संजोया जा रहा है। कवियों के नाम, प्रतिष्ठा बनाये रखने के लिए कविता बहार प्रतिबद्ध है।

सच बताना

हिंदी कविता

सच बताना सच बतानाबातें न बनानान मुंह चिढ़ानाऔर हाँ!मुझे नहीं पसंद तुम्हारा गिडगिडाना कि मेरे मरने के बादतुम्हे मेरी सदा भी आएगीकौन सी बात तुम्हे रुलाएगी मुझे पता हैमेरे मरने के बाद भीमैं थोडा बनी रहूंगी जैसे रह जाती हैखंडहर होते मंदिर मेंकभी गूंजी नूपुरों की झंकार सुबह के चौंधियाते उजाले मेंठिठका चंद्रमा रहूंगी तुम्हारे

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सूरज देता रौशनी हर कर तम का भार

हिंदी कविता

सूरज देता रौशनी  हर कर तम का भार सूरज देता रौशनी, हर कर तम का भार।लेकर के आगोश में, करता दिन विस्तार।। नभ में लाली छा गई, लेकर नव मुस्कान।जीव-जंतु जगने लगे, जगने लगा किसान।। उदर पूर्ति करने चले, छोड़े सभी मकान।दिन भर श्रम को पूजते, आया नहीं थकान।। समय साथ होता तभी, राही हो

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छंद की परिभाषा

हिंदी कविता

छंद की परिभाषा छंद शब्द ‘चद्’ धातु से बना है जिसका अर्थ है ‘ आह्लादित ” , प्रसन्न होना।‘वर्णों या मात्राओं की नियमित संख्या के विन्यास से यदि आह्लाद पैदा हो, तो उसे छंद कहते हैं’।छंद का सर्वप्रथम उल्लेख ‘ऋग्वेद’ में मिलता है। छंद के अंग- 1.चरण/ पद- छंद के प्रायः 4 भाग होते हैं।

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पिता धर्म निभना अति भारी-बाबू लाल शर्मा

समाज और यथार्थ

फादर्स डे पिताओं के सम्मान में एक व्यापक रूप से मनाया जाने वाला पर्व हैं जिसमे पितृत्व, पितृत्व-बंधन तथा समाज में पिताओं के प्रभाव को समारोह पूर्वक मनाया जाता है। अनेक देशों में इसे जून के तीसरे रविवार, तथा बाकी देशों में अन्य दिन मनाया जाता है।

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ख्वाहिशें हमसे न पूछो-बाबू लाल शर्मा “बौहरा”

हिंदी कविता

ख्वाहिशें हमसे न पूछो-बाबू लाल शर्मा “बौहरा” ख्वाहिशें हमसे न पूछो,ख्वाहिशों का जोर है,तान सीना जो अड़े है,वे बहुत कमजोर हैं।आज जो बनते फिरे वे ,शाह पक्के चोर हैं,ख्वाहिशें हमसे न पूछो,ख्वाहिशों का जोर है। ख्वाहिशें सैनिक दबाए,जो बड़ा बेजार है,जूझ सीमा पर रहा जो,मौत का बाजार है।राज के आदेश बिन ही,वह निरा कमजोर है,ख्वाहिशें

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वतन है जान से प्यारा -बाबू लाल शर्मा,बौहरा, विज्ञ

हिंदी कविता

वतन है जान से प्यारा -बाबूलाल शर्मा बौहरा विज्ञ सितारे साथ होते तो,बताओ क्या फिजां होती।सभी विपरीत ग्रह बैठे,मगर मय शान जिन्दा हूँ। गिराया आसमां से हूँ,जमीं ने बोझ झेला है।मिली है जो रियायत भी,नहीं,खुद से सुनिन्दा हूँ। न भाई बंधु मिलते है,सगे सम्बन्ध मेरे तो,न पुख्ता नीड़ बन पाया,वही बेघर परिन्दा हूँ। किया जाने

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प्रीत पुरानी-बाबू लाल शर्मा

हिंदी कविता

प्रीत पुरानी १६ मात्रिक मुक्तक थके नैन रजनी भर जगते,रात दिवस तुमको है तकतेचैन बिगाड़ा, विवश शरीरी,विकल नयन खोजे से भगते। नेह हमारी जीवन धारा।तुम्हे मेघ मय नेह निहारा।वर्षा भू सम प्रीत अनोखी,मन इन्द्रेशी मोर पुकारा। पंथ जोहते बीते हर दिन,तड़पें तेरी यादें गिन गिन।साँझ ढले मैं याद करूँ,तो,वही पुरानी आदत तुम बिन। यूँ ही

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