कविता बहार

"कविता बहार" हिंदी कविता का लिखित संग्रह [ Collection of Hindi poems] है। जिसे भावी पीढ़ियों के लिए अमूल्य निधि के रूप में संजोया जा रहा है। कवियों के नाम, प्रतिष्ठा बनाये रखने के लिए कविता बहार प्रतिबद्ध है।

मौत पर कविता: जिंदगी का पड़ाव या कुदरत का हसीन तोहफा- डा.नीलम

हिंदी कविता

मौत पर कविता मौत तू जिंदगी का पड़ाव है याहै कुदरत का हसीन तोहफा है आगोश तेरा बहुत ही शांत -शीतलजो हैं दुनियां से नाराज़ उन्हें है मिलता सुकून तुझसे है तू कहाँ कब किसी के पास जाती हैहर किसी को तू अपने पास बुलाती है कभी तू मेहरबां होती है तोनींद में ही ले […]

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लिखना पढ़ना पर कविता -अंचल

हिंदी कविता

लिखना पढ़ना पर कविता पढ़ना लिखना चाहिए,जीवन में जी मस्त।शिक्षित करते हैं सभी,संकट को जी पस्त।।संकट को जी पस्त,होत हैं भारी ताकत।डरते कभी न भाय,भगे जी संकट सामत।।कह कवि अंचल मित्र,कभी मत डर को गढ़ना।मंजिल पाना सत्य,सदा सब लिखना पढ़ना।। अंचल

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मतदाता पर कुण्डिलयाँ

हिंदी कविता

मतदाता पर कुण्डिलयाँ?? भाग्य विधाता भाग्य विधाता देश का, स्वयं आप श्रीमान।मिला वोट अधिकार है, करिये जी मतदान।।करिये जी मतदान, एक मत पड़ता भारी।सभी छोड़कर काम, प्रथम यह जिम्मेदारी।।कहे अमित यह आज, नाम जिनका मतदाता।मिला श्रेष्ठ सौभाग्य, आप ही भाग्य विधाता।। मतदाता मतदाता मत डालिए, लोकतंत्र की शान।वोट डालना आपको, शक्ति स्वयं पहचान।।शक्ति स्वयं पहचान,

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केवरा यदु मीरा के दोहे

हिंदी कविता

केवरा यदु मीरा के दोहे (1) चंदन माथे पर चंदन लगा, कैसा ढ़ोंग रचाय ।मंदिर मठ के नाम पर, वह व्यापार चलाय ।। (2)अग्निपथ सैनिक चलते अग्निपथ, लिये तिरंगा हाथ ।पीछे फिर हटते नहीं, कटे भले ही माथ ।। (3)दीपक बेटा कुल दीपक बना, बेटी का अपमान ।भ्रूण कोख में मारते, होगा कब सम्मान ।।

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गुरु घासीदास बाबा पर हिंदी कविता

समाज और यथार्थ

गुरू घासीदास छत्तीसगढ़ राज्य के रायपुर जिले के गिरौदपुरी गांव में पिता महंगुदास जी एवं माता अमरौतिन के यहाँ अवतरित हुये थे गुरू घासीदास जी सतनाम धर्म जिसे आम बोल चाल में सतनामी समाज कहा जाता है, के प्रवर्तक थे।

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सुसंस्कृत मातृभाषा दिवस पर कविता

हिंदी कविता

मातृभाषा दिवस पर कविता अपनी स्वरों में मुझको ‘साध’ लीजिए।मैं ‘मृदुला’, सरला, ले पग-पग आऊँगी।। हों गीत सृजित, लयबद्ध ‘ताल’ दीजिए।मधुरिमा, रस, छंद, सज-धज गाऊँगी।। सम्प्रेषित ‘भाव’ सतत समाहित कीजिए।अभिव्यंजित ‘माधुर्य’, रंग-बिरंगे लाऊँगी।‌। ‘मातृभाषा’ कर्णप्रिया, ‘सुसंस्कृत’ बोलिए।सर्व ‘हृदयस्थ’ रहूँ, ‘मान’ घर-घर पाऊँगी।। – शैलेंद्र नायक ‘शिशिर’

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हम किधर जा रहे हैं ?

विज्ञान, तकनीक और भविष्य

हम किधर जा रहे हैं क़यास लगाए जा रहे हैं,कि हम ऊपर उठ रहे हैं,क़ायम रहेंगे ये सवालात,कि हम किधर जा रहे हैं? कल, गए ‘मंगल’ की ओर,फिर ‘चंदा-मामा’ की ओर,ढोंगी हो गए, विज्ञानी बन,कब लौटेंगे ‘मनुजता’ की ओर? ‘संस्कृति’, ‘संस्कार’ ठेके पर हैं,‘देश’ और ‘शिक्षा’ ठेके पर हैं,जनता, सिर्फ पेट भरकर खुश है,‘सरकार’, ‘अदालत’

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सपनो पर कविता

हिंदी कविता

सपनो पर कविता सपनो में सितारे सजने दो,नदियों की धाराएँ बहने दो।शीतल हवाएँ मन की तरंगें,फूलों की खुशबू महकने दो। ऊँचे अरमानों को सजने दो,आकाश में पंछी उड़ने दो।समन्दर की ये सुहानी लहरे,जल में मछलियाँ तैरने दो। नजरों में नजारे रहने दो,पलकों में चाँद उतरने दो।बदले तो बदले ये जमाना,हर किसी को दीवाने रहने दो।

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हमसफ़र पर कविता

हिंदी कविता

हमसफ़र पर कविता प्यार का ओ एहसास हो,हमसफ़र मेरा साथ हो।कठिन रास्ते में निकला हूँ,इस सफर में तू मेरा साथ हो। ओ महफ़िल की रागिनी हो,ओ संगीत की तू वादिनी हो।दिल में बसे हो हमसफ़र,अँधेरे में तू मेरी चाँदनी हो। मेरी हर खुशी में तू साथ हो,दिल से जुड़ी तू खास हो।मेरे हमराही मेरे हमसफ़र,सदा

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पुराने दोस्त पर कविता

हिंदी कविता

पुराने दोस्त पर कविता हम दो पुराने दोस्तअलग होने से पहलेकिए थे वादेमिलेंगे जरूर एक दिन लंबे अंतराल बादमिले भी एक दिन उसने देखा मुझेमैंने देखा उसेऔर अनदेखे ही चले गए उसने सोचा मैं बोलूंगामैंने सोचा वह बोलेगाऔर अनबोले ही चले गए उसने पहचाना मुझेमैंने पहचाना उसेऔर अनपहचाने ही चले गए वह सोच रहा थाकितना झूठा

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रिश्ते पर कविता

हिंदी कविता

रिश्ते पर कविता दर्द कागज़ पर बिखरता चला गयारिश्तों की तपिश से झुलसता चला गयाअपनों और बेगानों में उलझता चला गयादर्द कागज़ पर बिखरता चला गया कुछ अपने भी ऐसे थे जो बेगाने हो गए थेसामने फूल और पीछे खंजर लिए खड़े थेमै उनमें खुद को ढूंढता चला गयादर्द कागज़ पर बिखरता चला गया बहुत

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विधवा पर कविता

समाज और यथार्थ

विधवा पर कविता सफेद साड़ी में लिपटी विधवाआँसुओं के चादर में सिमटी विधवामनहूस कैसे हो सकती है भला अपने बच्चों को वह विधवारोज सबेरे जगाती हैउज्जवल भविष्य कीf करे कामनाप्रतिपल मेहनत करती हैसर्वप्रथम मुख देखे बच्चेसफलता की सीढ़ी चढ़ते हैंसमझ नहीं आता फिर भीमनहूस उसे क्यूँ कहते हैं बेटी के लिए ढूँढें वर वहशादी का

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