कविता बहार

"कविता बहार" हिंदी कविता का लिखित संग्रह [ Collection of Hindi poems] है। जिसे भावी पीढ़ियों के लिए अमूल्य निधि के रूप में संजोया जा रहा है। कवियों के नाम, प्रतिष्ठा बनाये रखने के लिए कविता बहार प्रतिबद्ध है।

बेटी हूँ आपकी-भागवत प्रसाद साहू

प्रकृति और पर्यावरण

बेटी हूँ आपकी कोख मे पल रही , शीघ्र जग में आऊ। नन्ही सी परी बन,जन जन को बतलाऊ। हूं बेटी मैं आपकी,दूध का कर्ज चुकाऊ।एक नही दो-दो कुल की,लाज बचाऊ।बेटी हूं आपकी……………….। पंख नही फिर भी,आसमान उड़ जाऊ। मंगल पर रख कदम,दुनिया को हसाऊ।। बेटा नही बेटी हु इस धरा की,आवाज दे चिल्लाऊ।तू कहे

बेटी हूँ आपकी-भागवत प्रसाद साहू Read More »

गाय गरुवा के हड़ताल

नारी जीवन और संवेदना

गाय गरुवा के हड़ताल हमरो बनय राशन कारड चारा मिलय सरकारी ।सब्बो योजना ल छोड़ भर पेट मिलय थारी।जब तक पूरा न होवय गरुवा घुरुवा अउ बारी ।गाय गरुवा के हड़ताल रही जारी…….। छत्तीसगढ़ के चारो कोती हामर हावय चिन्हारी ।चाहे नेता चाहे बाबा चाहे ओ रास बिहारी।लोटा लोटा गोरस पियय चारा के नइये पुछारी

गाय गरुवा के हड़ताल Read More »

भारत माता रोती है -हृषिकेश प्रधान “ऋषि”

हिंदी कविता

         भारत माता रोती है जब-जब सीमा पर अपना,वीर सपूत खोती है ।तब भारत माता रोती है,तब भारत माता रोती है ।। सीने से लगाकर मां जिसको दूध पिलाती ।गोद में बिठाकर मां जिसको रोटी खिलाती ।छाती में लिटाकर  मां जिसको लोरी सुनाती। बाहों में झूलाकर  मां जिसको रोज सुलाती ।जब कोई मांअपने लाल का,पुण्यतिथि मनाती

भारत माता रोती है -हृषिकेश प्रधान “ऋषि” Read More »

स्वरोजगार तुमको ढूंढना हैं/डीजेन्द्र कुर्रे “कोहिनूर”

समाज और यथार्थ

“डीजेन्द्र कुर्रे की कविता ‘स्वरोजगार तुमको ढूंढना है’ में स्वावलंबन और आत्मनिर्भरता की प्रेरणा दी गई है। यह कविता युवाओं को स्वरोजगार के महत्व को समझाते हुए उन्हें प्रेरित करती है कि वे अपने सपनों को पूरा करने के लिए खुद को ढूंढें और अपने पैरों पर खड़े हों।” सारांश: “स्वरोजगार तुमको ढूंढना है” एक

स्वरोजगार तुमको ढूंढना हैं/डीजेन्द्र कुर्रे “कोहिनूर” Read More »

पिता होने की जिम्मेदारी – नरेन्द्र कुमार कुलमित्र

हिंदी कविता

पिता होने की जिम्मेदारी दो बच्चों का पिता हूँ मेरे बच्चे अक्सर रात मेंओढ़ाए हुए चादर फेंक देते हैओढ़ाता हूँ फिर-फिरवे फिर-फिर फेंकते जाते हैं उन्हें ओढ़ाए बिना… मानता ही नहीं मेरा मन वे होते है गहरी नींद मेंउनके लिए अक्सर टूट जाती हैंमेरी नींदें… एक दिन  गया था गाँव रात के शायद एक या दो

पिता होने की जिम्मेदारी – नरेन्द्र कुमार कुलमित्र Read More »

पितृ पक्ष का सच्चा श्राद्ध-धनंजय सिते(राही)

हिंदी कविता

पितृ पक्ष का सच्चा श्राद्ध ‘ आजका बच्चा कलका यूवाऔर परसो बुढ़ा होना है!ये प्रकृती का नियम है सबकोएक दिन इससे गुजरना है!!                  २आजकी बेटी कल पत्नी मातापरसो वह भी बनेगी सास!बेटा आजका कल पती,पिता हैदादा,नाना परसो का खास!!                 

पितृ पक्ष का सच्चा श्राद्ध-धनंजय सिते(राही) Read More »

इंतज़ार आँखे में

हिंदी कविता

इंतज़ार आँखे में इंतज़ार करती है आँखेहर उस शक्श की, जिसकी जेब भरी हो,किस्मत मरी हो, लूट सके जिसे,छल सके जिसे, इंतज़ार करती है आँखे। इंतज़ार करती है आँखेहर उस बीमार की, जो जूझ रहा है मर्ज में,औंधे पड़ा है फर्श में, कर सके जिससे अपनी जेब गर्म,लूट सके इलाज के बहाने, इंतज़ार करती है आँखे। इंतज़ार करती है आँखेहर

इंतज़ार आँखे में Read More »

सांध्य है निश्चल -बासुदेव अग्रवाल ‘नमन’

नारी जीवन और संवेदना

सांध्य है निश्चल रवि को छिपता देख, शाम ने ली अँगड़ाई।रक्ताम्बर को धार, गगन में सजधज आई।।नृत्य करे उन्मुक्त, तपन को देत विदाई।गा कर स्वागत गीत, करे रजनी अगुवाई।। सांध्य-जलद हो लाल, नृत्य की ताल मिलाए।उमड़-घुमड़ कर मेघ, छटा में चाँद खिलाए।।पक्षी दे संगीत, मधुर गीतों को गा कर।मोहक भरे उड़ान, पंख पूरे फैला कर।।

सांध्य है निश्चल -बासुदेव अग्रवाल ‘नमन’ Read More »

सेवा का संरक्षण- दिलीप कुमार पाठक “सरस”

हिंदी कविता

है झुकी डाल फल फूल फली,मुस्कानें लख-लख लहरातीं | था एक बीज जो वृक्ष बना, बरसातें उसको नहलातीं|| माटी पाकर आया बचपन,सेवा का संरक्षण पाया| लकड़ी पत्ती फल फूल कली, है सेवा की सिर पर छाया|| गुरु मातु पिता का संरक्षण, हम सबने ही कल पाया था| जिनके अपने श्रम के बल पर, कल अंकुर बन मुस्काया था|| कुछ

सेवा का संरक्षण- दिलीप कुमार पाठक “सरस” Read More »

निषादराज के दोहे

हिंदी कविता

*निषादराज के दोहे (1) संसारकितना प्यारा देख लो,ये अपना संसार।स्वर्ग बराबर हैं लगे,गाँव-शहर वनद्वार।। (2) समयसमय बड़ा अनमोल है,कीमत समझो यार।समय बीत जब जायगा,फँसो नहीं मझधार।। (3) गतिअपनी गति में काम को,करना अच्छा यार।तभी सफलता हैं मिले,उन्नति  घर संसार।। (4) जीवनजीवन की इस राह पर,चलना कदम सम्हाल।आगे   पीछे   देखना, रहे  न  कोई   काल।। (5) मनमन

निषादराज के दोहे Read More »

village based Poem

मेरे गांव का बरगद – नरेन्द्र कुमार कुलमित्र

हिंदी कविता

मेरे गांव का बरगद  मेरे गाँव का बरगदआज भी वैसे ही खड़ा हैजैसे बचपन में देखा करता थाजब से मैंने होश संभाला हैअविचलवैसे ही पाया है हम बचपन में उनकी लटों से झूला करते थेउनकी मोटी-मोटी शाखाओंके इर्द-गिर्द छुप जाया करते थेधूप हो या बारिशउसके नीचेघर-सानिश्चिंत होते थे  तब हम लड़खड़ाते थेअब खड़े हो गएतब हम बच्चे थेअब बड़े हो गएतब हम तुतलाते

मेरे गांव का बरगद – नरेन्द्र कुमार कुलमित्र Read More »

जीवन रुपी रेलगाड़ी – सावित्री मिश्रा

हिंदी कविता

जीवन रुपी रेलगाड़ी कभी लगता है जीवन एक खेल है,कभी लगता है जीवन एक जेल है।पर  मुझे लगता है कि ये जीवनदो पटरियों पर दौड़ती रेल है।भगवान ने जीवन रुपी रेल काजितनी साँसों का टिकट दिया है,उससे आगे किसी ने सफर नहीं कियासुख और दुख जीवन की दो पटरियाँ,शरीर के अंग जीवन रुपी रेल के

जीवन रुपी रेलगाड़ी – सावित्री मिश्रा Read More »

Scroll to Top