हसरतों को गले से लगाते रहे
हिंदी कविताहसरतों को गले से लगाते रहे हसरतों को गले से लगाते रहे,थोड़ा थोड़ा सही पास आते रहे..आप की बेबसी का पता है हमें,चुप रहे पर बहुत ज़ख़्म खाते रहे..इस ज़माने का दस्तूर सदियों से है,बेवजह लोग ऊँगली उठाते रहे..मेरी दीवानगी मेरी पहचान थी,आग अपने ही इसमें लगाते रहे..इश्क़ करना भी अब तो गुनह हो गया,हम
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