मधुमासी चौपाइयाँ
प्रकृति और पर्यावरणमधुमासी चौपाइयाँ शरद शिशिर ऋतु कब के बीते, हाथ प्रकृति के रहे न रीते।दिनकर चले मकर के आगे, ठंडक सूर्य ताप से भागे।1बासंती मधुमास महीना, सर्व सुगन्धित भीना- भीना।घिरा कुहासा झीना-झीना, धरा सजी ज्यों एक नगीना।2कलियों पर हैं भ्रमर घूमते, ऋतु बसंत को सभी पूजते।मादकता वन उपवन छाई, आतुरता हर हृदय समाई।3नये पात आये तरुओं

