मालविका अरुण की कवितायेँ
गुरु की महिमा
गुरु प्राचीन हैं पर विकास हैं
गुरु चेतना हैं, प्रकाश हैं
एक महान पद्धति का प्रमाण
गुरु, भारतीय संस्कृति का मान हैं।
गुरु श्रम हैं, प्रोत्साहन हैं
गुरु तप हैं, गुरु त्याग हैं
गुरु निष्ठा हैं, विश्वास हैं
गुरु हर चेष्टा का परिणाम हैं।
गुरु जिज्ञासा हैं, ज्ञान हैं
गुरु अनुभव हैं, आदेश हैं
गुरु कल्याण, गुरु उपदेश हैं
गुरु, एक जागृत जीवन का उद्देश्य हैं।
गुरु शिल्पकार हैं, कुम्हार हैं
गुरु स्तम्भ हैं, गुरु द्वार हैं
गुरु सोच का विस्तार हैं
प्रतिभाओं का उफान हैं ।
गंगोत्री व्यास
तो प्रवाह एक प्यास है
गुरु-शिष्य परंपरा
आज की मांग
कल्युग की आस हैं।
आशाओं का अस्मंजस
थम सी गयी है ज़िन्दगी
आज भागा-दौड़ी से मन बेहाल ज़्यादा है
धरोहर की पोटली बनानी है
पर आज थकान ज़्यादा है
हँसना है,कुछ खेलना है
पर आज संजीदगी और व्यस्तता ज़्यादा है
सफलता का स्वाद चकना है
पर आज असफताओं का भार ज़्यादा है
कोई सुगम मार्ग बनाना है
पर आज कठिनाईओं से मन घबराया ज़्यादा है
प्रेम और सम्मान मिले, ये आशा है
पर आज दूसरों की कमियों का बोध ज़्यादा है
बच्चों को सर्वश्रेष्ठ बनाना है
पर आज अपने बचपन की भूलों का गुमाँ ज़्यादा है
सुखमय ज़िन्दगी की कामना है
पर आज दुखों को दिया न्योता ज़्यादा है
मंदिर जैसा घर बनाना है
पर आज मन मैला ज़्यादा है
कहीं दूर स्वर्ग की कल्पना है
पर आज हर जगह प्रदुषण ज्यादा है
दुनिया में शान्ति रहे, ये प्रार्थना है
पर आज जीवन का मूल्य कम और स्वार्थ का ज्यादा है।
ऐसा लगता है
खाली दिमाग शायर का
लफ्जों का भूखा लगता है
चलो,कुछ पका लें, कुछ खा लें
ख्याल ये उम्दा लगता है।
बारिश की पहली बूँदें
तपिश का इनाम लगता है
आंसुओं से न मिटाओ
किस्सा हमारा
अभी भी जवान लगता है।
आती जब विमान में रफ़्तार
वो रुका हुआ सा लगता है
वक्त जब भरता उड़ान
थमा हुआ सा लगता है।
सब कुछ मिलता आसानी से
पर वक्त कहाँ मिलता है
मशीनों ने ऐसा हाथ बंटाया
कि हुनर की हैसियत बचाना
अब मुश्किल लगता है।
छोड़ दिया
हैरान है हम ऐसी नादानी पर
चलने की जल्दी में
यू लड़खड़ाए
कि हमने कदम बढ़ाना
ही छोड़ दिया।
बचपन को भी चलना आ गया
जब हमने बच्चों के जूतों में
पैर डालकर
उम्र का हिसाब रखना
ही छोड़ दिया।
समय की कीमत जब से जानने लगे
उसने हमारा मोल ही गिरा दिया
बेकद्री से जो की बेवफाई
उसने कद्र करना
ही छोड़ दिया।
किन कसमों की बात करें
किन लम्हों की फरियाद करें
मिले तुम कुछ इस तरह
कि हमने खुद से मिलना
ही छोड़ दिया।
निकल पड़ी सैर पर
सोच एक रोज़
जहान मैं बेशर्मी का यह आलम था
कि सोच ने बेपर्दा होना
ही छोड़ दिया।