
परिवार की खातिर ( कविता )
मजबूरी है साहब वरना वो
भीख नहीं मांगता,
यूँ बेसुध हो गलियों की
खाक नहीं छानता।
मजबूरी है तभी वो हाथ फैलता है,
तपती ज़मीन पर नंगे पैर चला आता है।
अपनी हालत पर रोता भी होगा,
क्या पता रात को वो सोता भी होगा।
उसका घर परिवार भी होगा,
छोटा सा एक संसार भी होगा।
कलियाँ भी चटकी होंगी कभी उसके आँगन में,
खुशियों की बरसात भी हुई होंगी सावन में।
क्या पता कैसे वो दीन बन गया,
क्यों सबकी निगाहो में हीन बन गया।
कहते है जैसा कर्म किया वैसा ही मिलता है,
जैसा बीज होगा वैसा ही फूल खिलता है।
वो कर्मो का नहीं शायद
ग़रीबी का मारा है,
हाँ गरीब ही है
इसलिए बेसहारा है।
इनकी भी तो कोई आस होती है,
जीवन की अधूरी कोई प्यास होती है।
बिखर कर रह जाते है सारे सपने,
आंखे बिना नींद के सोती है।
ईश्वर की भी अजीब माया है,
जाने कौन सा ये खेल रचाया है।
किसी को थमा दी लाखो की दौलत,
और किसी को दर का भिखारी बनाया है।
नेहा शर्मा….

Behtrin rachna Neha ji
धन्यवाद जी