2 अक्टूबर अहिंसा का अंतर्राष्ट्रीय दिवस पर कविता

2 अक्टूबर महात्मा गांधी का जन्मदिन, अहिंसा का अंतर्राष्ट्रीय दिवस

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हिन्दी दोहा मुक्तक : अहिंसा विषय

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हिन्दी दोहा मुक्तक : अहिंसा विषय देख देश की दुर्दशा,गाँधी छेड़े युद्ध ।सत्य अहिंसा मार्ग से, बनकर योगी बुद्ध।आंदोलन की राह में, सत्य बना आधार।मार खदेड़े शत्रु को, होकर भारी क्रुद्ध।। छोड़ें हिंसा राह को, चलें अहिंसा राह ।खून खराबा कृत्य से, हो जाएं आगाह।हमें बचाना देश हैं, वार्ता करके संधि ।हम रखवाले हैं वतन […]

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बापू ने ये राह दिखाई

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2 अक्टूबर को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के जन्मदिन के अवसर पर समर्पित कविता। यह कविता अन्तराष्ट्रीय अहिंसा दिवस का उत्सव गान भी करती है।

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महात्मा गाँधी पर दोहे

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महात्मा गाँधी पर दोहे ★★★★★★★★★★★★★★★★सत्य धरम की राह पर,चलकर हुए महान।भारत आज स्वतंत्र है,पा जिनका अवदान।। परम अहिंसा धर्म का,बनकर नित ही भक्त।राग द्वेष छल दंभ का ,बने नही आशक्त।। जीवन में पहने सदा , खादी का परिधान।मान स्वदेशी को दिया,रच दी परम विधान।। जीवन भर करते रहे,अपनों पर उपकार।परिस्थिति जो भी मिली,नहीं मनाया हार।।

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गांधी जी के सपनों पर कविता

समाज और यथार्थ

गांधी जी के सपनों पर कविता गांधीजी के सपनों का है ये भारत,उन्नत होकर विकसित होता ये भारत।ग्रामीण परिवेश में जागरूकता बढ़ाया,स्वदेशी अपनाकर अभियान चलाया।। आर्थिक सामाजिक न्याय बताकर,गाँव के विकास को समझाया।व्यापकता की दृष्टि फैलाकर,जाति,धर्म,भाषा के भेदभाव को मिटाया।। नर-नारी को समानता दिलाकर,जीवन जीने का ढंग बताया।आमजनों को शिक्षा देकर,मानव चेतना को जागृत कराया।।

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गाँधीजी पर कविता – बाबू लाल शर्मा

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गाँधीजी पर कविता भारत ने थी ली पहन, गुलामियत जंजीर।थी अंग्रेज़ी क्रूरता, मरे वतन के वीर।हाल हुए बेहाल जब, कुचले जन आक्रोश।देख दशा व्याकुल हुए, गाँधी वर मतिधीर। काले पानी की सजा, फाँसी हाँसी खेल।गोली गाली साथ ही , भर देते थे जेल।देशी राजा अधिक तर, मौज करे मदमस्त।गाँधी ने आवाज दी, कर खादी से

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नायक श्री गांधी की जय

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नायक श्री गांधी की जय स्वतंत्रता  के   वीर   सिपाही,नायक  श्री  गांधी  की  जय।अनुकरणीय  कृत्य उन्नायक,जय-जय गांधी,भव्य विजय। पूज्य   प्रेरणास्रोत  महात्मा,तुम्हें  याद   हम    करते  हैं।दिव्य-मार्ग  दे दिया निराला,चलकर   पार    उतरते   हैं।सुदृढ़ जिन्दगी जीकर तुमने,स्वर्णिम   राह    दिखाई   है,‘रघुपति राघव’ गाते  है  हम,उच्च-शिखर  पर  चढ़ते  हैं। नय के पालक मोहन-गांधी,आप  कर  गये   दूर अनय। वर्ष  अठारह  सौ  उनहत्तर,दो  

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