अस्तित्व (अतुकांत कविता)
मैं नाम लेकर पैदा नहीं हुआ,
नाम मुझे दिया गया।
मैं रास्ता लेकर नहीं आया,
चलते-चलते मैंने पगडंडी बनाई।
किसी ईश्वर ने मेरी पटकथा नहीं लिखी,
किसी भाग्य ने मेरी सीमा तय नहीं की।
मैं हर क्षण
अपने ही हाथों से
अपने होने की परिभाषा लिखता रहा।
लोग कहते हैं—
“तू ऐसा ही है”
पर मैं जानता हूँ,
मैं वैसा नहीं हूँ—
मैं वैसा बन रहा हूँ।
डर भी मेरा है,
निर्णय भी मेरा है,
गलती भी मेरी,
और उससे उठना भी।
भीड़ मुझे ढोना चाहती है,
पर मैं कंधों पर नहीं
पैरों पर खड़ा होना चाहता हूँ।
क्योंकि उधार का जीवन
जीवन नहीं होता।
अर्थ कहीं लिखा नहीं मिला,
तो मैंने ही उसे गढ़ लिया।
अंधेरे में कोई दीपक नहीं था,
तो मैंने खुद जलना स्वीकार किया।
मैं प्रश्न हूँ—
और उत्तर भी।
मैं बोझ हूँ—
और साहस भी।
मैं ही अपना कारण हूँ,
मैं ही अपना परिणाम।
यही मेरा अस्तित्व है—
चुना हुआ,
जिया हुआ,
और स्वीकार किया हुआ।






