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मैं हर पत्थर में तुम्हीं को देखता हूँ
नमन करुँ मैं अटल जी
इन गुलमोहरों को देखकर
चिड़िया पर कविता
भ्रूणहत्या-कुण्डलिया छंद
पथ की दीप बनूँगी
भावी पीढ़ी का आगामी भविष्य
एक बार लौट कर आ जाते
प्रातःकाल पर कविता
हम हलचल कर देंगे
छूकर मुझे बसंत कर दो
दिलीप कुमार पाठक सरस का ग़ज़ल
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