“भूख का शास्त्र”
भूखा आदमी
विचार नहीं करता,
वह रोटी की आकृति में ईश्वर देखता है।
जो टुकड़ा फेंक दे —
वही उसका भगवान बन जाता है।
भूख, आदर्शों की अंतिम परीक्षा है,
जहाँ नीति किताबों में रह जाती है
और पेट—
धर्मग्रंथ बन जाता है।
चापलूसी कोई गुण नहीं,
पर भूख उसे भी सिखा देती है
“जी हजूर” के मीठे उच्चारण,
“सत्य” से कहीं अधिक
लाभदायक लगते हैं।
भरे पेट वाले जब उपदेश देते हैं—
“आत्मसम्मान सबसे बड़ा है!”
तो भूखा मुस्कुराता है,
क्योंकि उसके लिए आत्मसम्मान
कभी-कभी बस एक सूखी रोटी जितना होता है।
वे कहते हैं—
“भूख में भी चरित्र नहीं गिरना चाहिए।”
पर जिन्हें कभी सचमुच भूख लगी हो
वे जानते हैं,
भूख केवल शरीर नहीं खाती,
वह आदमी का स्वर भी निगल जाती है।
भरे पेट वालों की प्रकृति अजीब है,
वे “दान” को पुण्य कहते हैं,
और “भूख” को आलस्य।
वे तृप्त रहते हैं, इसलिए
उन्हें भूखे का सिर झुकना “चरित्र-दोष” लगता है,
कभी जीवन की रणनीति नहीं।
कितनी सरल बात है—
भूख से बड़ी कोई विचारधारा नहीं,
फिर भी
सत्ता के दरबारों में
भरे पेट वाले ही नीति बनाते हैं।





