शिवाजी : मेरे आदर्श पुरुष – मनीभाई नवरत्न

शिवाजी : मेरे आदर्श पुरुष (अतुकांत कविता)

भारत की धरा पर
जब अन्याय का अंधेरा गहराता गया,
जब धर्म, संस्कृति और आत्मगौरव
जकड़नों में सिसकने लगे—
तभी उठे एक प्रकाश-पुरुष,
एक ज्योति जो दिशा भी बनी और संघर्ष भी।
यह ज्योति थी—
मेरे आदर्श पुरुष
छत्रपति शिवाजी महाराज।


उनका जन्म शिबनेरी के किले में हुआ—
पर वे किले की दीवारों तक सीमित न रहे।
जीजामाता के संस्कारों ने
उनके हृदय में धर्म-शक्ति, मातृभूमि-भक्ति
और अधर्म के प्रति विद्रोह भर दिया।
वे योद्धा थे—
पर उनके हाथों की तलवार
केवल अत्याचारियों पर उठती थी।
वे शासक थे—
पर उनके राज्य में
जाति नहीं, योग्यताएँ बोला करती थीं।
वे देशभक्त थे—
पर देश उनमें किसी सीमा में बँधा न था,
वह एक चेतना थी,
एक मार्गदर्शक दीप।


औरंगजेब की संकीर्ण नीतियाँ
जनता के हृदय को भय में बदल रही थीं।
पर शिवाजी ने
धर्म को किसी सम्प्रदाय की गुलामी नहीं बनने दिया।
उन्होंने कहा—
अधर्म का विरोध करना ही
सच्ची भक्ति है।
वे मुसलमानों के भी संरक्षक थे,
पर मुगल-अन्याय के
अडिग शत्रु।


उनकी नीति—
किले पहले, युद्ध बाद में।
उनका शासन—
ग्राम से दरबार तक
नीति, न्याय और अनुशासन की एक सुव्यवस्थित धारा।
अष्टप्रधान मण्डल
उनकी दूरदर्शिता का प्रमाण था।
उनके राज्य में
धर्म स्वतंत्र था,
पर कानून सबके लिए समान।
यह भारत के प्रशासन का
पहला स्वराज-नमूना था।


उन्होंने जहाँआरा बेगम को
सम्मान के साथ विदा किया।
शत्रुओं की स्त्रियों को
मां-बहन का आदर दिया।
मुसलमानों की धार्मिक पुस्तकें
ससम्मान लौटाईं।
शिवाजी के लिए
मनुष्य पहले मानव था,
फिर किसी धर्म का अनुयायी।
उनकी दृष्टि में
प्राण की रक्षा
धर्म की सबसे बड़ी साधना थी।


उनकी प्रतिज्ञा—
“स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है”—
केवल शब्द नहीं,
एक तप था।
एक आचरण,
जो सत्ता नहीं,
कर्तव्य की दिशा दिखाता था।
वे युद्धभूमि में आगे,
पुरुषार्थ में दृढ़,
और नीति में निर्मल थे।
उनके लिए विजय का अर्थ
नीति से जीतना था,
न कि छल से।


1680 में उनका शरीर भले ही शांत हो गया,
पर राष्ट्र की नसों में
जो चेतना उन्होंने प्रवाहित की—
वह आज भी धड़क रही है।
भारत की आत्मा
उनके नाम से प्रकाश पाती है।
वह हमें सिखाते हैं—
कि वीरता केवल प्रहार में नहीं,
उदारता और न्याय में भी होती है।
कि शासक वही
जो जनता का रक्षक बने।
कि राष्ट्रजीवन
जातीय गौरव के बल से ही
अमर होता है।

शिवाजी—
एक नाम नहीं,
एक प्रेरणा हैं।
मेरे आदर्श पुरुष,
मेरे देश का गौरव,
मेरी आत्मा की पुकार।

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