मदर टेरेसा : ममता और सेवा की मूर्ति -मनीभाई नवरत्न

मदर टेरेसा : ममता और सेवा की मूर्ति -मनीभाई नवरत्न


अल्बानिया की धरती से जन्मी
यह करुणा की धारा
भारत की मिट्टी में समा कर
पूरी दुनिया की माँ बन गई।
दुख को अपना आभूषण,
सेवा को अपना धर्म
और मनुष्य को
ईश्वर का ही अंश मानने वाली
वह अनूठी शक्ति—
यही थीं मदर टेरेसा।


स्कोप्जे के छोटे-से घर में
अगनेस गोंक्सा नाम की एक बालिका
जब पहली बार स्कूल पहुँची,
तभी उसकी आँखों में
मनुष्य मात्र के लिए करुणा का दीया जल गया।
यीशु के प्रेम और त्याग के उपदेशों ने
उसके भीतर यह सत्य अंकित किया—
कि सेवा ही सबसे महान शिक्षा है।
आत्मा की पुकार ने
उसे जीवन की दिशा दी,
और वही अगनेस
एक दिन टेरेसा बन गई—
दुखियों की माँ।


उन्होंने अपना घर छोड़ा,
अपनी मिट्टी छोड़ी,
अपने सपनों को
दूसरों के जीवन का सहारा बना दिया।
कलकत्ता की गलियों में उतरकर
उन्होंने महसूस किया
कि गरीबी केवल भूख नहीं,
एक दर्द है—जो आत्मा को चुभता है।
सिर्फ पाँच रुपये से
उन्होंने सेवा का दीप जलाया,
और “निर्मल हृदय”
हजारों टूटे दिलों का आश्रय बन गया।
अनाथ बच्चों की आँसू भरी आँखों में,
कुष्ठ रोगियों के घावों में,
बेघर लोगों की थरथराती साँसों में—
उन्होंने ईश्वर को देखा,
और जीवन भर उसी को पूजा।


उनकी ममता ने
सीमाएँ तोड़ीं,
उनकी सेवा ने
विश्व का हृदय छुआ।
और दुनिया ने
उन्हें सम्मान दिया—
पद्मश्री,
रैमन मैगसेसे,
ऑर्डर ऑफ ब्रिटिश एम्पायर,
नोबेल शांति पुरस्कार,
और भारत की ओर से—
भारत रत्न।
पर उनके लिए
सबसे बड़ा पुरस्कार
किसी रोगी के चेहरे की मुस्कान थी,
किसी अनाथ बच्चे की
उम्मीद भरी दृष्टि।


मिशनरीज ऑफ चैरिटी—
उनका बनाया हुआ यह परिवार
आज दुनिया के 100 से अधिक देशों में
सेवा का दूसरा नाम बन गया है।
अनाथालय,
कुष्ठ निवारण केन्द्र,
वृद्धाश्रम,
अस्पताल,
विद्यालय—
हर जगह उनकी छाया है।
उनकी सेवा दीवारों में नहीं,
मनुष्यों के हृदयों में बसी है।


मदर कहती थीं—
“ईश्वर को देखने के लिए
किसी मंदिर की जरूरत नहीं,
एक दुखी मनुष्य को गले लगा लो,
वहीं भगवान मिल जाएगा।”
उनकी साड़ी का सफेद रंग
सत्य का प्रतीक था,
नीली सीमा
शांति और करुणा की स्मृति।
वे दया नहीं देती थीं—
वे प्रेम बाँटती थीं।
वे रोटी नहीं,
सम्मान देती थीं।
वे दीन-दुखियों पर एहसान नहीं,
उनके जीवन में
आशा का दीप जलाती थीं।


उन्होंने कहा था—
“दुनिया में रोटी की भूख से बड़ी
प्यार की भूख है।”
आज भी जब घरों में
प्रेम घट रहा है,
रिश्ते टूट रहे हैं,
और मनुष्य मनुष्य से दूर हो रहा है—
उनकी यह वाणी
हमारे कानों में गूँजती है।
उनका जीवन सिखाता है—
कि सेवा कोई अवसर नहीं,
एक आंतरिक श्रद्धा है।
कि त्याग कमजोरी नहीं,
मानवता की सबसे बड़ी ताकत है।
कि एक व्यक्ति भी
दुनिया बदल सकता है—
अगर उसके हृदय में
प्रेम का दीप जलता हो।

मदर टेरेसा नहीं रहीं—
पर उनका संदेश,
उनका स्पर्श,
उनका आँचल
अब भी दुनिया को ढँक रहा है।
वे अल्बानिया में जन्मीं,
पर भारत ने उन्हें
अपने हृदय में बसाया।
वह चली गईं,
पर उनकी ममता
हमेशा जीवित रहेगी—
एक अमर आलोक बनकर।

-मनीभाई नवरत्न

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