पं० जवाहरलाल नेहरू -मनीभाई नवरत्न

पं० जवाहरलाल नेहरू -मनीभाई नवरत्न

इतिहास के पन्नों पर
एक नाम
गुलाब की पंखुड़ी–सा कोमल,
पर संघर्ष की आग–सा प्रखर—
जवाहरलाल नेहरू

राजसी वैभव में जन्मे,
पर मन में सादगी का उजाला लिए;
14 नवम्बर 1889—
मोतीलाल नेहरू की शान,
स्वरूप रानी की आँखों का तारा।
घर के शिक्षकों से सीखा पहला अक्षर,
और जल्द ही इंग्लैण्ड का मार्ग
उनकी सीख का विस्तार बन गया।

हैरो की गलियों से लेकर
कैम्ब्रिज के प्रांगण तक
उन्होंने जाना—
ज्ञान केवल डिग्रियों का नाम नहीं,
विचारों की उड़ान है।
बी.एस-सी और बैरिस्टरी की उपाधियों से सजे
वे लौटे तो भारत
अब उन्हें बुला रहा था—
गुलामी के विरुद्ध उठती कराहों में।

धनी पिता का बेटा
अब जनता के बीच का ‘जवाहर’ बन चुका था।
गाँधी से मिली एक बार,
तो मार्ग तय हो गया—
संघर्ष ही जीवन है।
जेल की दीवारों ने
उनके उत्साह को न रोका,
बल्कि और धार दी।
असहयोग से सत्याग्रह तक,
हर आंदोलन में वे अग्रिम पंक्ति थे।

सन् 1929—
लाहौर की रात,
रावी के किनारे,
जब उन्होंने स्वाधीनता का झंडा उठाया,
तो हवा में केवल एक प्रतिध्वनि थी—
“पूर्ण स्वराज।”

और फिर आया 1942—
भारत छोड़ो।
नेहरू का संकल्प
लोहे-सा कठोर था।
जेल उन्हें बाँध न सकी,
विचार निरंतर उड़ते रहे—
राष्ट्र की मुक्ति के लिए।

स्वतंत्रता की घड़ी आई,
और 14 अगस्त 1947 की रात
भारत ने उन्हें अपना प्रथम प्रधानमंत्री पाया।
रामेश्वरी नेहरु के हाथों से
तिलक लिए उस मस्तक ने
अपने आपको
जनता की सेवा में समर्पित कर दिया।

उन्होंने लोकतंत्र की नींव रखी,
संस्थाएँ गढ़ीं,
विज्ञान को विकास का मार्ग बनाया।
पंचशील का संदेश देकर
विश्व को समझाया—
शांति ही मानवता का भविष्य है।

‘पिता के पत्र पुत्री के नाम’
और ‘विश्व इतिहास की झलक’—
जैसी कृतियाँ
उनके ज्ञान का सजीव प्रमाण हैं।

1962 का चीन युद्ध,
उनके हृदय पर गहरी चोट था।
और अंततः
27 मई 1964—
राष्ट्र का यह दीपक
अनंत में विलीन हो गया।
पर शोक के उस सागर में
एक ही भावना थी—
“नेहरू अमर हैं।”

आज भी
शान्ति वन की मिट्टी
उनकी स्मृति से सुवासित है।
देश का हर नागरिक
उन्हें याद करते हुए कहता है—
वे केवल प्रधानमंत्री नहीं थे,
जनता-जवाहर थे,
भारत की आत्मा का एक उज्ज्वल स्वर।

इस रचना को शेयर करें
Scroll to Top