विनोबा भावे — मनीभाई नवरत्न

विनोबा भावे — मनीभाई नवरत्न

भारत की मिट्टी
जब सामाजिक असमानताओं से
थकने लगी थी,
जब भूमि और मन
दोनों बंटते-बंटते
अपनी करुण पुकार में डूब चुके थे—
तब एक शांत साधु उठा,
माथे पर तेज,
मन में करुणा,
और हाथों में केवल
अहिंसा का स्पर्श।
वह था—
विनोबा भावे।

महाराष्ट्र के छोटे से गाँव गागोदे में
एक बालक ने
अपनी माँ के भजनों में
धर्म नहीं,
जीवन का सूत्र सीखा।
रुक्मणिबाई की आवाज
उन्हें भीतर तक ले गई—
जहाँ गीता
शब्द नहीं,
श्वास बनकर बस गई।

पढ़ाई में आगे बढ़ते हुए
उनके भीतर
एक नीरव तप चलता रहा।
और 1916 की वह सुबह,
जब वे गांधी से मिले—
भारत का भविष्य
एक नया मार्ग चुन चुका था।
गांधी ने उन्हें पहचाना—
जैसे गुरु
अपने शिष्य को पहचानता है
पहली दृष्टि में।
उन्होंने विनोबा को
साबरमती का दीप बताया।
और वह दीप
कभी बुझा नहीं।

आश्रम के हर कार्य—
हथकरघे से लेकर सफाई तक—
विनोबा ने केवल किया नहीं,
जीया।
उनकी साधना
शब्दों की नहीं,
व्यवहार की रही।
वे सत्याग्रह के पथ पर चले,
जेल गए,
परंतु जेल की दीवारों को
प्रवचन का आश्रम बना दिया।
कैदी
उनकी वाणी में
स्वतंत्रता का स्वाद चखने लगे।

फिर आया वह समय,
जब विनोबा ने
देश को एक नए शास्त्र का उपहार दिया—
भूदान।
भूमि की असमानता
उन्हें केवल आँकड़ा नहीं लगती थी,
वह उनके लिए
मानवता का घाव थी।
और घाव पर मरहम
कानून से नहीं,
करुणा से लगता है।

इसलिए वे निकले—
नंगे पैर,
संध्या के प्रकाश में
प्रार्थना की गूँज से ओतप्रोत।
हर गाँव उनके आने पर
साँस रोक लेता था।
और जब वे कहते—
“भाई, थोड़ी भूमि दे दो
उनके लिए
जिनके पास कुछ भी नहीं,”
तो भूस्वामी का मन
अचानक जलाशय बन जाता,
जिसमें देने का जल
बिना आग्रह बह पड़ता।

तेलंगाना में
पहली भूमि मिली—
और यह बीज
क्षण भर में
एक forest बन गया।
हजारों एकड़ भूमि
मुट्ठी भर शब्दों से पिघलती चली गई।
दान देने वाले
विनोबा को नहीं,
अपनी ही अंतरात्मा को
भेंट देते थे।
यह दृश्य
आँखों को नहीं,
आत्मा को नम कर देता था।

यह आंदोलन
धीरे-धीरे
“ग्रामदान” बन गया—
जहाँ भूमि ही नहीं,
पूरा गाँव
समानता की साँस लेने लगा।
नेहरू ने सराहा,
विदेशी वैज्ञानिक हैरान हुए,
और दुनिया ने देखा—
एक साधु
कैसे अर्थशास्त्र को
मानवता का शास्त्र बना देता है।

विनोबा ने
डाकुओं को मार्ग दिखाया,
हरिजनों को मंदिरों का द्वार,
और राजनीति को
अहिंसा का नया आयाम।
बिना पद, बिना शक्ति,
वे वह कर गए
जो सेनाएँ और शासन
सदियों में नहीं कर सके।

जीवन के अंत में
उन्होंने मौन को चुना—
जैसे सारी बातें
दुनिया को कह चुके हों।
पवनार आश्रम
उनके आखिरी दिनों का साक्षी बना।
और 15 नवंबर 1982 को
जब उनका शरीर शांत हुआ—
दुनिया ने
एक ऋषि को खोया।
न्यूयॉर्क टाइम्स ने लिखा—
“यह वह व्यक्ति था
जो पृथ्वी बाँटता था
जैसे ईश्वर कृपा बाँटता है।”

विनोबा भावे
आज भी जीवित हैं—
हर उस खेत में
जो दान में मिला,
हर उस गाँव में
जो समानता से बसा,
हर उस हृदय में
जो देने से
स्वयं को पाता है।

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