महात्मा गांधी – मनीभाई नवरत्न
(मौलिक | अतुकांत शैली | संपूर्ण जीवन-गाथा समाहित)
एक युग—
जिसने सत्य और अहिंसा को
केवल विचार नहीं,
बल्कि जीवन की धड़कन बनाया,
उस युग का नाम था—
महात्मा गांधी।
एक साधारण घर में जन्मा बालक,
पर उसकी आत्मा में
मानो भारत का भविष्य लिखा था।
2 अक्तूबर 1869, पोरबन्दर—
समुद्र की लहरों से घिरा छोटा-सा नगर;
पर वहाँ जन्मा मोहनदास
एक दिन पूरे संसार की
लहरों का रुख बदल देगा—
किसे पता था।
पिता कर्मचंद,
माता पुतलीबाई—
धर्म, सत्य, करुणा, तप—
इन सबका संगम
मोहान के स्वभाव में धीरे-धीरे
शांत धार की तरह उतरता गया।
बचपन में वह
झूठ से डरता था,
गलत कामों से बचता था,
और सत्य को
जैसे किसी आंतरिक दीपक की तरह
हृदय में जलाए रखता था।
कस्तूरबा से विवाह,
उच्च शिक्षा की चाह,
और इंग्लैण्ड जाने से पहले
माता के चरणों में किया व्रत—
मांस नहीं, शराब नहीं,
और कोई अनुचित संग नहीं।
प्रतिज्ञाएँ कठिन थीं,
पर मोहनदास
उन्हें निभाने की दृढ़ मिट्टी से बने थे।
इंग्लैण्ड से बैरिस्टर बनकर लौटे,
पर भारत की धूल में
उनके जीवन का मार्ग
अभी लिखा जाना बाकी था।
फिर दक्षिण अफ्रीका—
एक मुकदमे के लिए गए,
पर वहाँ उन्हें
अपमान की आग ने छुआ।
ट्रेन से फेंके जाने का वह क्षण
उनके भीतर
नया मनुष्य गढ़ने लगा;
विरोध की पहली चिंगारी
यहीं भड़की।
गोरों का अत्याचार,
जातीय भेदभाव,
कानून का अन्याय—
उन्होंने इन सबके आगे
घुटने टेकने से मना कर दिया।
यहीं जन्मा—
सत्याग्रह,
वह हथियार जो
मन को शुद्ध करता है
और अत्याचार को
अपनी ही छाया से डराता है।
अफ्रीका से लौटकर
गांधी बदल चुके थे—
अब वे केवल मोहनदास नहीं,
एक विचार थे
जो भारत को जगाने आए थे।
1919—
असहयोग का बिगुल,
1920—
विदेशी वस्त्रों की होली,
1921—
देश का हर कोना
स्वराज्य की गूंज बन गया।
गांधी ने
खादी को सम्मान दिया,
अछूतोद्धार को आंदोलन बनाया,
ग्रामोद्योग को राष्ट्र का भविष्य कहा,
और सत्य-अहिंसा को
स्वतंत्रता की राह।
1929—
नमक सत्याग्रह।
दांडी की मिट्टी में
बूढ़े पैरों की चाल
इतनी दृढ़ थी
कि अंग्रेजी साम्राज्य
उसकी धूल से भी काँप गया।
जेल—
गांधीजी के लिए
सत्य की प्रयोगशाला थी।
वहाँ उन्होंने
मनुष्य की आत्मा को
अधिकारों और कर्तव्यों की
नयी परिभाषा दी।
1937 में कांग्रेस सरकारें आईं,
पर संघर्ष समाप्त नहीं हुआ।
1942—
भारत छोड़ो आंदोलन।
देश का बच्चा-बच्चा
अंग्रेजों को हटाने
सड़कों पर उतर आया।
जेलें भरीं,
दिल जलते रहे,
और गांधी
अहिंसा के दीपक की तरह
अडोल खड़े रहे।
फिर आया विभाजन का अंधेरा—
एक ऐसा निर्णय
जिसने गांधी के हृदय को
हजार टुकड़ों में बाँट दिया।
15 अगस्त 1947—
देश स्वतंत्र हुआ,
पर गांधी कहीं दूर,
कलकत्ता की गलियों में
रक्तपात रोकने के लिए
उपवास कर रहे थे।
स्वतंत्रता की खुशी
उनकी आँखों में
अश्रुओं की परत बनकर अटकी रही।
और फिर—
30 जनवरी, 1948।
बिरला भवन का शांत प्रांगण
अचानक एक गोली की आवाज से काँप उठा।
नाथूराम गोडसे के हाथों
गांधी गिर पड़े—
पर उनके मुख से निकले केवल दो शब्द—
“हे राम।”
उस क्षण
मानो संसार थम गया।
एक शरीर का अंत था—
पर एक विचार का जन्म—
जो कभी नहीं मरने वाला था।
राजघाट पर समाधि बनी,
पर असली समाधि—
जनता के हृदय में है।
गांधी सत्य हैं,
अहिंसा हैं,
साहस हैं,
और वह दीपक—
जिसे बुझाने की शक्ति
किसी युग में नहीं।
उनका जीवन कहता है—
सत्य कठिन है,
पर असंभव नहीं।
अहिंसा धीमी है,
पर अपराजेय है।
और एक मनुष्य—
पूरे राष्ट्र का चरित्र
बदल सकता है।
गांधी की गाथा
समाप्त नहीं होती—
वह हर सूर्योदय के साथ
भारत की आत्मा में
फिर से जागती है।






