सूरदास : एक जागृति-यात्रा – मनीभाई नवरत्न

Surdas

सूरदास : एक जागृति-यात्रा

(अतुकांत कविता)

कविता का आरम्भ वहीं होता है
जहाँ मन प्रश्न करता है—
दृष्टि का मूल्य क्या है?
दिखाई देने वाली दुनिया बड़ी है
या भीतर जलती हुई अनुभूति?
और तभी कोई सूरदास-सा मनुष्य
एक अंधकार को रोशनी में बदल देता है।

सीही हो या रुनकता—
स्थान बदल जाता है,
पर प्रतिभा का स्रोत नहीं।
1540 के आसपास जन्मा एक बालक
अपनी उम्र से पहले ही
जीवन की खामोशियों को सुनना सीख गया।

लोग कहते रहे—
वह जन्म से अंधा था,
कुछ कहते—युवावस्था में
और कुछ कहते—बुढ़ापे में दृष्टि खोई।
पर एक सत्य बार-बार सामने आता है—
जिसने कृष्ण को हृदय में देख लिया
वह बाहरी प्रकाश पर निर्भर नहीं रहता।

कुएँ में गिरा वह शरीर
छः दिनों की नीरव प्रतीक्षा में पड़ा रहा,
और सातवें दिन
प्रकट हुई वह दृष्टि
जो नेत्रों की नहीं
आत्मा की होती है।
सूर ने उसी क्षण जाना—
किसी और को देखने से बड़ा
एक भगवान को देख लेना है।

गऊघाट की शांत शाम में
जब वल्लभाचार्य का आगमन हुआ
तब सूरदास का जीवन
अपनी दिशा से मिल गया।
एक पद, एक विनय, एक कम्पित स्वर—
और आचार्य की वाणी—
“सूर होकर ऐसे क्यों विलाप करते हो?
लीला का गान करो।”

बस वहीं से
कविता नहीं, साधना शुरू हुई।

‘सूरसागर’ केवल ग्रंथ नहीं
एक सभ्यता की सांस्कृतिक गंगा है।
वात्सल्य वहाँ मातृत्व की ऊष्मा बनता है,
शृंगार
मन की मधुर थिरकन।
भ्रमरगीत
विरह की तीखी धूप है
और ‘राखो पति गिरिवर’
एक आत्मा की निर्विकल्प पुकार।

अंधा कहा जाने वाला वह कवि
बचपन की बाल-लीलाओं में
यशोदा की उँगलियों पर बँधे प्रेम को
इस तरह लिखता है
जैसे उसने स्वयं
किसी गोपाल के कपोलों पर
माखन की चमक देखी हो।

ब्रजभाषा उसके अधरों पर
शहद की तरह बहती रही—
सरल, मधुर, पारदर्शी।
अलंकार उसके पास श्रम से नहीं आए,
भावों से उपजे।
उसकी कविता में रस था
पर उससे बड़ा था
उसका मनुष्य-मन का ज्ञान।

सूरदास केवल कवि नहीं,
वह एक स्मरण है—
कि मनुष्य की सीमा
उसके नेत्रों से तय नहीं होती।
जिसके भीतर भक्ति का दीपक जलता है
उसके लिए अंधकार भी
मार्गदर्शक हो जाता है।

आज जब मनुष्य
अपनी क्षमताओं को
अपनी कमियों से मापता है
तब सूरदास पुकारते हैं—
देखो स्वयं को भीतर से।
दृष्टि खो जाने पर भी
यदि लक्ष्य बचा है
तो तुम अधूरे नहीं।

पारसौली में उनका शरीर शांत हो गया,
पर उनका प्रकाश
किसी दीपक की तरह
हर युग में नया होता रहेगा।
सूरदास इस बात का प्रमाण हैं
कि भक्ति, कला और सत्य
कभी मरते नहीं।
और मनुष्य
अपनी सीमाओं से नहीं
अपनी साधना से पहचाना जाता है।

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