सुकरात : सत्य का साहस / मनीभाई नवरत्न

सुकरात

सुकरात : सत्य का साहस

(मौलिक प्रेरक कविता)

एथेंस की गलियों में
एक साधारण-सा व्यक्ति
नंगे पाँव चलता था—
कपड़ा फटा हुआ,
चेहरा साधारण,
पर विचार अप्रतिम।

वह रुकता,
लोगों से प्रश्न करता,
फिर मुस्कुराकर कहता—
“मैं कुछ नहीं जानता,
बस इतना जानता हूँ
कि मैं अज्ञानी हूँ।”

और इसी स्वीकार से
वह जगत का
सबसे बड़ा ज्ञानी बन गया।

सुकरात—
जिसने ज्ञान को
शब्दों में नहीं,
प्रश्नों में खोजा।

जो बैठकर पढ़ाता नहीं था,
चलते-चलते,
बोलते-बोलते,
लोगों के मन के अंधकार में
दीप-सी जिज्ञासा जलाता था।

उसकी कक्षा
किसी विद्यालय में नहीं—
एथेंस की प्रत्येक सड़क थी,
प्रत्येक मोड़ था
जहाँ संवाद की चिंगारी
नया सत्य जगाती थी।

वह सिखाता था—
“पहले स्वयं को जानो,
फिर संसार को समझना आसान हो जाएगा।”

वह कहता था—
“ज्ञान वही है
जो जीवन को बेहतर बना दे।”

जिसने अज्ञान को
घृणा नहीं,
बल्कि सुधार का अवसर माना।

युवाओं ने उसे
गुरु माना,
ज्ञानी कहा,
अनुकरणीय आदर्श समझा—
पर सत्ता ने
उसके प्रश्नों से
खतरा महसूस किया।

आरोप लगे—
धर्म का अपमान,
युवाओं को भटकाना,
पुरखों की परंपरा पर प्रहार।

पर सुकरात ने
कभी किसी पर
अंगुली न उठाई,
सिर्फ विचारों को
नए मार्ग दिए।

जब अभियोग चला
और मृत्यु दंड सुनाया गया,
तो मित्रों ने कहा—
“गुरुदेव, भाग चलिए,
समय अभी भी है!”

पर सुकरात ने
शांत स्वर में कहा—
“जो सत्य पर खड़ा है
उसे भागना नहीं चाहिए।
अन्याय सहना
अन्याय करने से
हमेशा श्रेष्ठ है।”

और उसने
जहर का प्याला
हाथ में लिया—
वह कांपा भी नहीं,
क्योंकि
जिस आत्मा को अमर माना,
वह शरीर के नष्ट होने से
कभी नहीं डरता।

एक साधारण-सा व्यक्ति
उस दिन अमर हो गया,
जब वह सत्य के लिए
स्वयं को बलिदान कर गया।

सुकरात हमें सिखाता है—
कि ज्ञान
पुस्तकों में बंद नहीं,
प्रश्नों में बसता है।

कि साहस
शस्त्रों में नहीं,
सत्य के लिए
अडिग रहने में होता है।

कि महानता
वही है
जो अपने विचारों से
दुनिया को जगाए—
चाहे उसके बदले
जीवन ही क्यों न देना पड़े।

सुकरात—
एक नाम नहीं,
एक प्रकाश है,
एक पथ है,
एक प्रेरणा है,
जो हर युग को कहती है—

“सत्य पर चलो,
विचारों को परखो,
और जिज्ञासु बने रहो—
क्योंकि यही वह मार्ग है
जो मनुष्य को
अंधकार से प्रकाश तक ले जाता है।”

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