अरस्तू : ज्ञान का आकाश
— एक प्रेरक, दीर्घ, मौलिक कविता
स्टैगिरा की मिट्टी में
एक बालक जन्मा—
शांत-सा, जिज्ञासु-सा,
पर दृष्टि में छिपी थी
विचारों की बिजली।
उसके पिता
राजदरबार के वैद्य थे,
इसलिए राजमहलों की छाया
उसके बचपन पर पड़ी,
पर उस बालक का मन
वैभव में नहीं,
विचारों की खोज में रम गया।
अरस्तू—
जिसका नाम
आज भी ज्ञान के आकाश पर
ध्रुवतारे-सा स्थिर है।
बचपन में ही
पिता की मृत्यु हुई,
फिर भी उसकी जिज्ञासा
कभी न मरी।
सत्रह वर्ष का हुआ
तो एथेंस पहुँचा,
जहाँ प्लेटो—
महान गुरु—
उसका स्वागत करते हुए बोले,
“यह बच्चा चलने वाला वृक्ष है।”
और सचमुच
वह दर्शन का एक विशाल वृक्ष बन गया।
प्लेटो की अकादमी में
बीस वर्षों तक
वह सीखता रहा—
तर्क के बीज बोता,
ज्ञान की जड़ों को सींचता,
और समझता रहा कि
सत्य सिर्फ विचार नहीं,
अनुभव भी है,
अवलोकन भी है,
सवाल भी हैं।
गुरु ने कहा—
“जग को रूपों में देखो।”
शिष्य ने कहा—
“जग को देखो
जैसा वह वास्तव में है।”
यही मतभेद
यही स्वतंत्रता
उसे अरस्तू बनाती है—
स्वतंत्र विचार का प्रतीक।
फिर वह बुलाया गया
मकदूनिया के राजमहल में—
जहाँ एक किशोर
सिकंदर महान,
उसका शिष्य बना।
गुरु ने उसे
केवल राजनीति नहीं,
न्याय का मार्ग भी सिखाया;
केवल युद्ध नहीं,
ज्ञान की शक्ति भी बताई।
सिकंदर दुनिया जीत सका,
पर गुरु ने—
मानव-मन का संसार जीता।
एथेंस लौटकर
उसने लाइसियम बनाया,
जिसकी गलियों में
वह घूमता हुआ पढ़ाता—
धीरे-धीरे चलते हुए,
तर्क की रोशनी जलाते हुए।
इसीलिए
उसके अनुयायी कहलाए—
पेरीपेटेटिक्स—
“चलते-फिरते विचारक।”
अरस्तू ने पूछा—
मन कैसे सोचता है?
मनुष्य क्यों डरता है?
सत्य क्या है?
जीवन का उद्देश्य क्या है?
और उत्तर खोजने से पहले
वह प्रकृति को पढ़ता,
पक्षियों को देखता,
समुद्र की लहरों को सुनता,
जीवों की रचना समझता—
क्योंकि विज्ञान उसके लिए
एक खुली पुस्तक थी।
उसने सौंदर्यशास्त्र में
‘पोएटिक्स’ दिया,
जीवनचर्या में ‘एथिक्स,’
राजनीति में ‘पोलिटिक्स,’
विज्ञान में ‘हिस्ट्री ऑफ एनिमल्स,’
और दर्शन की धारा को
नई दिशा दी।
उसने दुनिया को बताया—
“मानव तर्कशील प्राणी है।”
और
“सद्गुण ही वास्तविक सुख है।”
जब उस पर आरोप लगे,
वह बोला—
“एथेंस ने सुकरात को ज़हर दिया,
मैं दूसरे दार्शनिक अपराध से
उसे बचाऊँगा।”
और एथेंस छोड़कर
चल्सिस चला गया।
वहीं 62 वर्ष की आयु में
उसने देह छोड़ी,
पर विचार छोड़ गए
अमरता का मार्ग।
आज भी पश्चिम का ज्ञान,
विज्ञान की भाषा,
तर्क की पद्धति,
राजनीति का स्वरूप,
नैतिकता की व्याख्या—
सबमें अरस्तू जीवित है।
वह न कवि था,
न सेनापति,
न राजा—
पर उसके विचारों ने
राजाओं और युगों को
बदला है।
अरस्तू—
वह दीपक है
जो समय की आंधियों में भी
न बुझा।
ज्ञान का आकाश
आज भी उसके नाम पर
चमकता है,
और युगों को पुकारता है—
“मत मानो परंपरा को अंधा होकर,
सत्य को परखो—
क्योंकि प्रश्न ही
ज्ञान का पहला द्वार है।”
- मनीभाई नवरत्न






