चार्ल्स डार्विन : प्रकृति का अन्वेषक – मनीभाई नवरत्न

चार्ल्स डार्विन : प्रकृति का अन्वेषक

बारह फ़रवरी की सुबह
एक बालक जन्मा इंग्लैंड में—
शांत, सरल, पर
आँखों में छिपा था
अनवरत खोज का प्रकाश।

उसके मन में प्रश्न थे—
पेड़ क्यों बढ़ते हैं?
पक्षी क्यों बदलते हैं?
कछुओं के खोल अलग क्यों?
फूलों के रंग भिन्न क्यों?
और जीवन इतना विविध
फिर भी एक जैसा क्यों?

डार्विन—
जिसने इन प्रश्नों को
वैज्ञानिक साहस में बदला।

बीस वर्ष का होते-होते
वह प्रकृति का विद्यार्थी बन चुका था।
फिर एक दिन
HMS Beagle के पतवार पर
वह प्रकृति की विशाल पुस्तक
खोलने निकल पड़ा।

पाँच वर्षों की समुद्री यात्रा—
धरती, द्वीप, जंगल, पर्वत,
हर जीव, हर कण
उसके लिए ज्ञान की पंक्तियाँ बनते गए।

गैलापागोस के द्वीपों पर
जब उसने चिड़ियों की चोंचें देखीं,
तो उसके मन में जन्मा
विज्ञान का एक महान बीज—
कि प्रकृति बदलती है,
प्रजातियाँ बदलती हैं,
जीवन एक सतत यात्रा है।

उसने हर नमूना
मन से छुआ,
हर जीव को देखा
जैसे कोई कहानी पढ़ रहा हो।

वह समझ गया—
प्रकृति चयन करती है।
मजबूत टिकते हैं,
कमज़ोर ढलते हैं,
और जीवन धीरे-धीरे
नए रूप लेता है।

इसी को उसने कहा—
Natural Selection — प्राकृतिक वरण।

यह कोई कल्पना नहीं थी,
यह थी प्रकृति की भाषा,
जिसे डार्विन ने पढ़ा
और दुनिया को पढ़ाया।

उसने कहा—
मनुष्य अलग नहीं,
जीवन की उसी महान धारा का हिस्सा है,
जो छोटे-से कीट से लेकर
बड़े से बड़े जीव तक बहती है।

उसका सिद्धांत
सिर्फ जीवशास्त्र नहीं,
मनुष्य को विनम्र बनाता है—
जिससे हम समझते हैं
कि हम प्रकृति के स्वामी नहीं,
उसकी निरंतर कहानी का
एक छोटा-सा अध्याय हैं।

Origin of Species
पुस्तक नहीं,
विज्ञान का वह दीपक है
जिसने दुनिया के ज्ञान अंधकार को
नई दिशा दी।

डार्विन ने वर्षों तक
विशेषज्ञों से पत्र लिखे,
हर तथ्य को परखा,
हर प्रमाण को तौला—
क्योंकि उसके लिए
विज्ञान विश्वास नहीं,
सत्यापित अनुभव था।

अपने अध्ययन में
उसने अनगिनत समय
बर्नाकल, जीवाश्म,
और असंख्य नमूनों की
सूक्ष्म जाँच में बिताया।
वह खोज का तपस्वी था—
जिसके लिए प्रयोग ही ध्यान था,
और सच ही ईश्वर।

धीरे-धीरे
उसका सिद्धांत
विश्व का सत्य बन गया—
विद्यालयों में,
प्रयोगशालाओं में,
वैज्ञानिक विचारों में,
और मानव विवेक में।

डार्विन ने दिखाया—
कि विज्ञान
कभी अचानक नहीं जन्मता,
वह सैकड़ों प्रश्नों,
हज़ारों निरीक्षणों
और वर्षों की निष्ठा का परिणाम होता है।

आज जब हम
जीवों का क्रम समझते हैं,
नए-नए जीवों की उत्पत्ति देखते हैं,
या प्राकृतिक विविधता का विस्तार खोजते हैं—
हम डार्विन की दृष्टि से ही देखते हैं।

वह चला गया 1882 में—
पर विज्ञान का वृक्ष
अब भी उसके विचारों से फलता है।

चार्ल्स डार्विन—
वह नाम नहीं,
जिज्ञासा का ध्वज है;
वह वैज्ञानिक नहीं,
प्रकृति का दूत है;
वह खोजकर्ता नहीं,
विकास की कहानी का
सबसे महान कथाकार है।

– मनीभाई नवरत्न

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