अष्टावक्र : ज्ञान का उजियारा – मनीभाई नवरत्न

अष्टावक्र : ज्ञान का उजियारा - मनीभाई नवरत्न

अष्टावक्र : ज्ञान का उजियारा

गर्भ से ही सत्य बोलने का
जिसे वरदान मिला,
वह था अष्टावक्र—
आठ वक्रों वाला,
पर भीतर से
अद्भुत तेज लिये
जन्मा एक बाल ऋषि।

पिता कहोड़ वेद पढ़ाते,
पर एक दिन उच्चारण में त्रुटि हुई—
और गर्भ में पलता बालक
जैसे ही बोला—
“पिताजी, यह पाठ गलत है”—
तो क्रोध में दुखित मन ने
उसे शाप दे दिया—
“टेढ़ा होगा तू आठ स्थान से!”

शरीर टेढ़ा हुआ,
पर बुद्धि और चरित्र
सीधे, निर्मल, अग्नि-से प्रखर।

जन्म लेते ही नियति ने
कठिन पथ लिख दिया था—
पिता जल में डुबो दिये गये,
वह नाना उद्दालक की गोद में पला,
मामा श्वेतकेतु को भाई मानता रहा,
जब तक सत्य से पर्दा हट न गया।

एक दिन सत्य जान
बालक के चरण डगमगाए नहीं—
वह संकल्प बनकर उठा—
“मैं अपने पिता का मान लौटाऊँगा।”

फिर आया जनक दरबार का दिन।
द्वारपाल ने रोका,
तो बालक हँसकर बोला—
“राजमहल में प्रवेश उम्र से नहीं,
बुद्धि की ऊँचाई से होता है!”

सभा में सन्नाटा छा गया—
सभी की आँखें मुड़ गईं
उस बालक-ऋषि की ओर,
जो उम्र में बालक,
पर तेज में सहस्र सूर्यों-सा लगा।

जनक ने पूछा—
“कौन जानता है संवत्सर के रहस्य?”
अष्टावक्र ने
उसके छिपे अर्थों को
क्षण भर में खोल दिया—
ऋतु, माह, पक्ष, दिवस—
सब उसके उत्तरों में
ज्ञान के दीपक बन गये।

फिर प्रश्नों का प्रवाह चला—
मछली, अंडा, पत्थर और नदी—
हर उत्तर
वेदमयी सरलता से
उसके होंठों से फूट पड़ा।

इस बालक से
कोई श्लोक, कोई संख्या,
कोई सिद्धांत छिपा न रह पाया।
वह भी नहीं,
जो बंदी जैसे महान विद्वान
जीवन भर गिनते रहे।

अंततः शास्त्रार्थ में
बंदी मौन हो गया—
उसका ज्ञान सीमित था,
और अष्टावक्र का
असीम।

विजय मिली—
पर अष्टावक्र ने
अहंकार नहीं धारण किया।
वह बोला—
“मेरे पिता और अन्य ब्राह्मण कहाँ हैं?”

तब बंदी बोला—
“मैं वरुणपुत्र हूँ—
सबको भेजा था पिता के पास,
अब उन्हें लौटा रहा हूँ।”

और सभा में
जल-गर्भ से लौटे
कई ब्राह्मण आए—
उनमें एक थे कहोड़—
जिन्हें देखकर
अष्टावक्र के नेत्र भर आये।

पिता के चरण
अश्रु से धुले—
कहोड़ बोले—
“पुत्र! समंगा नदी में स्नान करो—
शाप दूर हो जाएगा।”

और जैसे ही
अष्टावक्र ने जल स्पर्श किया—
आठों वक्र
सीधे हो गये।

केवल शरीर नहीं,
भाग्य भी सीधा हुआ—
ज्ञान और सत्य के बल पर।

अष्टावक्र—
जिसने जग को सिखाया—
कि शरीर की आकृति नहीं,
मन की जागृति मायने रखती है।

कि एक सच्चा प्रश्न,
हज़ार झूठे उत्तरों से बड़ा होता है।

कि जो सत्य का पथ चुनता है,
उसे कोई वक्रता रोक नहीं सकती।

और उसकी वाणी आज भी कहती है—

“अहंकार का बोझ उतार दो,
ज्ञान का दीप जला लो,
अपने भीतर के सत्य को पहचानो—
यही अद्वैत है,
यही मुक्ति है,
यही अष्टावक्र का संदेश है।”

– मनीभाई नवरत्न

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