लाओ–सू : मार्ग का महागुरु -मनीभाई नवरत्न

लाओ–सू : मार्ग का महागुरु

प्राचीन चीन के धूसर बादलों
और शांत पर्वतों के बीच
एक आत्मा जन्मी—
जिसे संसार ने पुकारा—
लाओ–सू,
अर्थात् “आदरणीय वृद्ध गुरु”

इतिहास धुँधला है,
समय की धूल पन्नों पर जमी है—
कुछ कहते—वह मिथक था,
कुछ कहते—कई महान आत्माओं का
एक संयुक्त स्वरूप।
पर सत्य यह है—
ज्ञान जब जन्म लेता है,
तो व्यक्ति नहीं, विचार बनकर जीता है।

कहते हैं—
वह झोऊ राजवंश में
शाही अभिलेखागार का रक्षक था—
शब्दों, काव्यों, सूत्रों,
प्राचीन दर्शन की
असीमित कुंजियों का संरक्षक।
वहीं से जागा उसमें
ताओ—मार्ग का मौन संगीत।

कहानियाँ कहती हैं—
उसने कभी कोई विद्यालय नहीं खोला,
फिर भी शिष्य स्वयं चले आते—
क्योंकि उसके मौन में भी
एक वाणी थी,
और उसके वचनों में
जल की धारा जैसा सरल सत्य।

एक दिन कन्फ्यूशियस आया—
नैतिकता और नियमों का प्रवक्ता—
लाओ–सू ने कहा—
“अत्यधिक ज्ञान का बोझ
मनुष्य को भारी बना देता है,
जैसे अधिक भंडार
किसी घर को जर्जर।”
कन्फ्यूशियस लौट तो गया,
पर उसके हृदय में
एक तूफ़ान जाग उठा था।

समय बीता—
और राज्य की नैतिक मिट्टी
दरकने लगी।
लाओ–सू के मन में
दुख का बादल छा गया।
वह जान गया—
कि जब समाज
अपने ही अहंकार से अंधा हो जाए,
तो मौन होकर चल देना
ही सबसे ऊँचा उपदेश होता है।

वह पश्चिम की ओर निकला—
असीम भूभाग की ओर,
जहाँ पहाड़ थे,
विस्तृत हवा थी,
और मनुष्य का कोलाहल पीछे छूट जाता था।

पश्चिमी द्वार पर
एक संतरी—यिन-क्सी,
उसने पहचान लिया—
“तुम ही वह हो
जिसमें ब्रह्म का स्वर घुला है।
जाने से पहले
अपनी वाणी का खजाना हमें दे जाओ।”

लाओ–सू रुका—
और एक छोटे से निवास में
रात-दर-रात
एक अमर ग्रंथ उतरा:
“ताओ ते चिंग”
सत्व, सहजता और समर्पण का ग्रंथ,
जहाँ लिखा था—
“जो झुकता है वही अडिग रहता है,
जो रीत जाता है वही भरता है।”

कुछ कहते—
यिन-क्सी उसका शिष्य बन गया,
कुछ कहते—उसने भारत की यात्रा की,
कुछ कहते—वही बुद्ध था,
या बुद्ध का गुरु।
पर सत्य वही है—
वह जहाँ भी गया,
ताओ का बीज
उसी धरती पर अंकुरित हुआ।

किंवदंतियाँ कहती हैं—
उसका पुत्र—ज़ोंग
युद्ध का वीर था।
जब उसने शत्रुओं की लाशें
गिद्धों के लिए छोड़ दीं—
लाओ–सू प्रकट हुआ।
उसने कहा—
“विजय का सौंदर्य
केवल करुणा में है,
अपमान में नहीं।”
और उसके शब्द
युद्ध के मैदान में
शांति के कमल बनकर खिल गये।

समय आगे बढ़ता रहा—
वंश चले, साम्राज्य उठे, गिरे—
पर ली वंश, तांग शासक, और
असंख्य कुल
स्वयं को उसका वंशज मानकर
गौरव अनुभव करते रहे।

आज भी चीनी सभ्यता
उसके वचनों में साँस लेती है—
धीरे चलो,
जल जैसा बनो,
बल से नहीं,
सहजता से जीतो।

लाओ–सू—
एक व्यक्ति नहीं,
एक पथ है—
एक मार्गदर्शक हवा,
जो कहती है—

“जो स्वयं को खाली करे,
उसे संपूर्ण ब्रह्मांड भर देता है।
जो शांत हो जाए,
वही महान हो जाता है।”

ताओ की यह गूंज
आज भी सुनाई देती है—
मौन में,
सरलता में,
संतुलन में,
और हर उस क्षण में
जब हम स्वयं से कहते हैं—
“छोड़ देना ही सबसे बड़ी शक्ति है।”

-मनीभाई नवरत्न

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