
सवाल (अतुकांत कविता)
सवाल
वह नहीं जो किताब में छपा हो,
सवाल वह है
जो मन में चुभे।
सवाल
वह नहीं जो उत्तर माँगे,
सवाल वह है
जो नींद छीन ले।
जब बाहर ठीक दिखता हो,
और भीतर कुछ ठीक न लगे—
वहीं से
सवाल जन्म लेता है।
सवाल
भीड़ से नहीं आता,
सवाल
अकेलेपन में
खुद से टकराकर
उभरता है।
जो कहा गया है
उसे मान लेना आसान है,
पर
“क्यों?” पूछना
हिम्मत माँगता है।
सवाल
इंकार नहीं है,
सवाल
जागना है।
जहाँ विश्वास अंधा हो जाए,
वहीं सवाल
आँख खोलता है।
और सच यह है—
उत्तर कभी हमें नहीं बदलते,
सवाल ही हैं
जो हमें नया बना देते हैं।






