समझ / मनीभाई नवरत्न

समझ
जानकारी नहीं है।
जो पढ़ ली जाए,
याद कर ली जाए—
वह समझ नहीं।

समझ
वह है
जो देखने के बाद
बदलने को विवश कर दे।

जो सच दिखा दे
और फिर
पुराना बने रहना
असंभव कर दे—
वही समझ है।

समझ
भावना नहीं है।
आँसू आ जाएँ,
दिल भर आए—
यह संवेदना हो सकती है,
समझ नहीं।

समझ
तब होती है
जब आँसू नहीं,
भ्रम गिरते हैं।

जब
दोष देना छूटता है,
शिकायत थमती है,
और
जिम्मेदारी
स्वाभाविक लगने लगती है।

समझ
समाधान नहीं देती—
वह समस्या को
खत्म कर देती है।

जहाँ समझ है,
वहाँ
बार-बार वही गलती
दोहराई नहीं जाती।

समझ
शब्दों में नहीं रहती,
वह
आचरण में
उतर आती है।

जिस दिन
तुम कहने के बजाय
करने लगो—
समझ आ चुकी होती है।

समझ
शांति का अभिनय नहीं,
वह
स्पष्टता का परिणाम है।

और
स्पष्टता आने पर
संघर्ष
अपने आप
गिरने लगते हैं।

समझ
कोई उपलब्धि नहीं—
वह
भ्रमों का
छूटना है।

और
जब भ्रम छूटते हैं,
तो
जीवन
अपने आप
सीधा हो जाता है।

यही
समझ है।

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