“जेब और जिस्म की शादी”
शादी—
एक ऐसा शब्द
जिसके भीतर प्रेम से ज़्यादा
भ्रम रहता है।
हम सोचते हैं
हम किसी व्यक्ति को चुन रहे हैं—
पर सच में
हम उसके भीतर नहीं देखते,
सिर्फ़ उसकी सतह को नापते हैं।
लड़की की दृष्टि
लड़के की जेब में उतरती है—
वह भविष्य नहीं ढूँढती,
भविष्य की गारंटी ढूँढती है।
जैसे मनुष्य नहीं,
एक बीमा पॉलिसी चुन रही हो
जिस पर “सुरक्षित जीवन” लिखा हो।
लड़का
लड़की के शरीर पर ठहरता है—
वह सौंदर्य नहीं देखता,
सिर्फ़ अपना अधिकार देखता है।
जैसे किसी देह से
जीवन का अर्थ,
और किसी आकार से
सुख की परिभाषा निकाल सकता हो।
दोनों एक-दूसरे को देखते हैं—
पर असल में
दोनों किसी और को देख रहे होते हैं:
लड़की
लड़का नहीं,
उसकी कमाई को।
लड़का
लड़की नहीं,
उसकी काया को।
और इस क्षण
एक अदृश्य आवाज़ पूछती है—
“जब चयन ही वस्तुओं पर आधारित हो,
तो संबंध मनुष्यों के बीच कैसे बनेगा?”
समाज कहता है—
“यह व्यावहारिक होना है।”
और मन
धीमे से पूछता है—
“या यह सिर्फ़
हमें धीरे-धीरे
वस्तु बनने की ओर धकेलना है?”
क्योंकि जहाँ
जेब और जिस्म
मिलन की शर्तें बन जाएँ,
वहाँ प्यार नहीं,
अहंकारों का व्यापार चलता है—
और हम इसे
संस्कार कहकर
हर पीढ़ी में
दोहराते चले जाते हैं।
मनीभाई नवरत्न



