चूल्हे से चौपाल तक
राष्ट्रीय महिला दिवस (भारत) पर अतुकांत कविता
(समर्पित सरोजिनी नायडू की जयंती – 13 फरवरी)
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चूल्हे की आँच में
सदियों से तपती रही एक देह
पर उस देह में
एक स्वप्न भी था—
जो धुएँ से ऊपर उठना चाहता था।
वह सिर्फ रोटी नहीं सेंकती थी,
वह समय को गूँथती थी,
आटे में मिलाती थी
संघर्ष की गंध,
और परोसती थी
घर को जीवित रहने का साहस।
कभी उसकी आवाज़
बर्तन की खनक में दब जाती,
कभी आँचल की ओट में
आँसू चुपचाप सूख जाते।
पर इतिहास गवाह है—
जब-जब चौपाल सजी,
उसने अपने कदम
रसोई की देहरी से बाहर रखे।
उसने सवाल किए,
उसने निर्णयों में हिस्सा माँगा,
उसने कहा—
“मैं सिर्फ घर की दीवार नहीं,
मैं समाज की आधार हूँ।”
चूल्हे की राख से
उसने शब्द उठाए,
और चौपाल तक पहुँचकर
उन्हें स्वर दिया।
वह खेतों में पसीना है,
कार्यालयों में परिश्रम,
विद्यालयों में ज्ञान,
सीमा पर साहस,
और संसद में विचार।
वह माँ है—
पर सिर्फ ममता नहीं,
वह शक्ति है—
पर सिर्फ सहनशीलता नहीं।
वह कविता है
जो अब बंद पन्नों में नहीं रहती,
वह गूँज है
जो चौपाल से निकलकर
देश के हर कोने तक पहुँचती है।
राष्ट्रीय महिला दिवस
सिर्फ एक तिथि नहीं,
एक स्मरण है—
कि चूल्हे की लौ से
राष्ट्र का दीप जलता है।
और जब वह
अपने अधिकारों के साथ खड़ी होती है,
तो चौपाल भी बदलती है,
समाज भी बदलता है,
और इतिहास
नई इबारत लिखता है।
आज वह कहती है—
“मैं सीमाएँ नहीं, संभावनाएँ हूँ।
मैं परंपरा भी हूँ, परिवर्तन भी।
मैं चूल्हे की ऊष्मा से
चौपाल की चेतना तक
अपनी यात्रा स्वयं लिखती हूँ।”





