छिपे चंद्रिका से हम बैठे

छिपे चंद्रिका से हम बैठे

छिपे चंद्रिका से हम बैठे
कक्षों में पर्दे लटके।
धूप सुहाती नही आज क्यों
तारों की गिनती खटके।

प्राकृत की छवि कानन भूले
देख रहे तरु चित्रों को
वन्य वनज वन जीव उजाड़े
भूल गये खग मित्रों को

विहग नृत्य की करे कल्पना
खग मृग व्याल मनुज गटके।
छिपे चंद्रिका……….।।

निज संस्कृति के झूले मेले
किले महल मरु धोरे सम
अमिय पास पहचान न पाए
पीते रहे हलाहल हम

वाम पंथ पछुआ ललचाए
पेड़ खजूर चढ़े अटके।
छिपे चंद्रिका………..।।

सत्य सनातन रीत भूलते
ऋषियों के आचरणों को
दृश्य विदेशी स्वप्न गीत में
छंदों के व्याकरणों को

नदियों की पावनता भूले
मात पिता गायें भटके।
छिपे चंद्रिका से………।।

खान पान पहनावा बदला
संगत पंगत रीत रही
अवसर स्वार्थ अर्थ लालच में
पावन मानस प्रीत बही

लाक्ष्यागृह में स्वप्न सँजोते
चलचित्रो में नद तट के।
छिपे चंद्रिका…………।।
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✍©
बाबू लाल शर्मा *विज्ञ*
बौहरा – भवन
सिकंदरा,दौसा,राजस्थान
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