बेटी और पत्नी को उड़ान भरने की प्रेरणा देती मनीभाई की कविता

मत बाँधो उसे
रिश्तों की परिभाषाओं में,
वह बेटी है तो आकाश भी है,
वह पत्नी है तो विश्वास भी है।
उसके सपनों पर
संदेह की छाया मत डालो,
वह जिस दिशा में बढ़े
वहीं सूरज उगने दो।
बेटी को कहो —
“तेरे पंख मेरे आशीर्वाद से मज़बूत हैं,
तू गिर भी जाए तो
मेरी दुआ तुझे संभाल लेगी।”
पत्नी से कहो —
“तेरे साथ चलना ही नहीं,
तेरे आगे बढ़ने पर गर्व करना भी
मेरा धर्म है।”
वह घर भी सँभाल सकती है
और दुनिया भी जीत सकती है,
बस ज़रूरत है
विश्वास की उस एक सीढ़ी की
जो हम उसके नीचे रख दें।
मत रोको उसकी उड़ान,
उसके सपनों को आकाश दो,
क्योंकि जब वह ऊँचा उठती है
तो परिवार की पहचान भी ऊँची होती है।
वह त्याग की मूर्ति नहीं,
सिर्फ सहनशीलता का नाम नहीं,
वह संकल्प है,
वह संभावना है,
वह स्वयं अपनी पहचान है।
उसे कहो —
“तू सीमाएँ नहीं, क्षितिज है।
तू बंधन नहीं, विस्तार है।
तू हमारे घर की रौशनी ही नहीं,
समाज का उजाला भी है।”
जब बेटी उड़ती है
तो पिता का सीना चौड़ा होता है,
जब पत्नी आगे बढ़ती है
तो पति का सम्मान और बढ़ता है।
उसे पंख दो,
उसकी राह में साथ दो,
क्योंकि उसकी जीत
तुम्हारी हार नहीं,
तुम्हारे प्रेम की सबसे बड़ी जीत है।





