अभी और लिखने हैं – मनीभाई नवरत्न
अभी और लिखने हैं इतिहास के पन्नों में ।
कुछ क्रांति ,कुछ शांति के शब्द।
अभी और होगा एलान ए जंग ।
तब धरा होगी शांत और स्तब्ध ।
अभी चिंगारी फूटने को है मस्तिष्क में
प्रवाह बड़ेगा अभी नैन अश्क में
तब तो होगा रात्रि से दिवस आगमन
गूंजेगी तभी सतयुग के शब्द ।
गुलामी की जंजीर टूट चुकी
पर लोग अभी भी हैं हवालात में ।
वे पहले से और असहाय लग रहे हैं
वे बंध चुके राजनीति के करामात में ।
लिखते-लिखते लेखनी भी हो रही है छुब्ध।
पर अभी और लिखने हैं…..






