लक्ष्य / मनीभाई नवरत्न

ऐसा लक्ष्य चुनो, जहाँ पहुँचा ही न जा सके

ऐसा लक्ष्य मत चुनो कि जो पूरा हो जाए।
बल्कि ऐसा लक्ष्य चुनो
जो हमें आख़िरी साँस तक
चलाए रखे।
क्योंकि जिस दिन
हम कहते हैं कि —
मैं पहुँच गया अपने लक्ष्य तक —
उसी दिन
पतन शुरू हो जाता है।

पूर्णता का भ्रम
सबसे बड़ा विश्राम है।
और विश्राम
अहंकार का प्रिय आसन।
इसलिए उद्देश्य
इतना ऊँचा होना चाहिए
कि उसे
कभी पूरा न किया जा सके।
ताकि हम हमेशा
शिष्य बनके रहे ।
हमेशा सीखते रहे ।
हमेशा सजग रहे ।

यही निरंतर परिश्रम की शर्त है।
यही अनंत गति का रहस्य है।
और वह
अंतिम उद्देश्य क्या है?
न सफलता।
न उपलब्धि।
न पहचान।
वह है—
बोध।
मुक्ति।
अहंकार का विलय।
उस “मैं” से मुक्ति
जो सब कुछ चाहता है—
और कभी तृप्त नहीं होता।

एक साधक था—
जो एक ऊँचे पर्वत की ओर चल पड़ा।
लोगों ने पूछा—
“वहाँ क्या है?”
उसने कहा—
“शिखर।”
लोग हँसे—
“शिखर तो सब चाहते हैं।
पर वहाँ पहुँचकर करोगे क्या?”
साधक चुप रहा।

वह जानता था—
जो शिखर के बारे में बोल देता है,
वह वहीं अटक जाता है।
रास्ते में एक यात्री मिला,
जो चोटी से उतर रहा था।
उसके चेहरे पर गर्व था,
और पैरों में थकान।
उसने कहा—
“मैं पहुँच गया था।
देखो, यह पत्थर—
मैं इसे साथ लाया हूँ,
सबूत है मेरी विजय का।”

साधक ने पत्थर को देखा,
फिर उसकी आँखों को।
आँखों में ऊँचाई नहीं थी,
सिर्फ़ स्मृति थी।
साधक ने आगे बढ़ना चुना।
रास्ता कठिन होता गया।
साँसें टूटने लगीं।
हर क़दम पर
“मैं” का बोझ भारी होता गया।
तभी मार्गदर्शक मिला और पूछा—
“क्या खोज रहे हो?”
साधक बोला—
“लक्ष्य।”

मार्गदर्शक मुस्कराया—
“तो तुम अभी जीवित हो।
जिस दिन लक्ष्य मिल जाएगा,
उसी दिन तुम संग्रहालय बन जाओगे।”
फिर उसने कहा—
“पर्वत पर मत रुको।
रुकना मृत्यु है।
चलते रहना ही साधना है।”

साधक ने पूछा—
“तो अंतिम मंज़िल क्या है?”
उत्तर आया—
“जहाँ चलने वाला भी मिट जाए।
और रास्ता भी।”
तभी साधक समझ गया—
लक्ष्य कोई बिंदु नहीं,
एक दिशा है।
एक ऐसा क्षितिज
जो जितना पास जाता है,
उतना ही पीछे हट जाता है—
ताकि यात्री जीवित रहे।

उस दिन से
साधक ने शिखर नहीं खोजा,
उसने सजगता चुनी।
वह जान गया—
सफलता ठहराती है।
उपलब्धि सुला देती है।
पहचान बाँध देती है।
और बोध चलाता है।
मुक्ति हल्का करती है।

अहंकार का विलय—
पहियों से भार उतार देता है।
अब वह चलता है बिना पहुँचे।
सीखता है बिना ज्ञानी बने।
जीता है बिना विजेता हुए।
और यही उसका उद्देश्य है—
एक ऐसा उद्देश्य
जो पूरा नहीं होता,
बल्कि पूरा मनुष्य बना देता है।

अहंकार को सीधे टकराकर
नहीं तोड़ा जा सकता।
वह संघर्ष में और कठोर होता है।
विरोध में और चतुर।
वह गलता है
केवल सही कर्म में—
ऐसे कर्म में जो उसे
खिलाता नहीं,
बल्कि धीरे-धीरे
पिघलाता है।

इसलिए
ऐसा काम चुनो
जो तुम्हारी छवि
न बढ़ाए,
पर तुम्हारे होने को संवार दे।
ऐसा काम जो तुम्हें
ऊपर न उठाए—
बल्कि ज़मीन से
जुड़ा रखे।
ऐसा काम जो
श्रेष्ठता का नशा न दे,
पर सजगता बनाए रखे।
और याद रखो—
अहंकार कभी
पूरी तरह
खत्म नहीं होता।
इसलिए कोई
अंतिम विजय नहीं।
कोई सेवानिवृत्ति नहीं।
कोई “अब बस” नहीं।

आग
आख़िरी साँस तक
जली रहनी चाहिए।
यही विधि है।
ऐसा लक्ष्य चुनो
जो तुम्हें
हमेशा छोटा रखे—
और मार्ग को
हमेशा पवित्र।
तब मार्ग ही
गंतव्य बन जाता है।
और चलना ही मुक्ति।
क्योंकि जो
चलते-चलते
जाग्रत रहता है,
वही वास्तव में
मुक्त होता है।

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